जनरल बाजवा–फ़ैज़ पर गंभीर आरोप, आतंकियों की सरपरस्ती का दावा


पाकिस्तान में दहशतगर्दों को बसाने और उन्हें मुआवज़ा देने को लेकर सामने आए बयान ने मुल्क की सियासत और फौजी कियादत पर संगीन सवाल खड़े कर दिए हैं। बिलाल खान अफरीदी के हवाले से सामने आई जानकारी में दावा किया गया है कि जनरल बाजवा और जनरल फैज़ ने दहशतगर्द अनासिर को पाकिस्तान में बसाने और उनके नुक़सान का मुआवज़ा देने को मुल्क की “सिक्योरिटी पॉलिसी” का हिस्सा बताया। इस खुलासे के बाद पाकिस्तान के अंदर और बाहर दोनों जगह बहस तेज़ हो गई है कि आख़िर एक ऐसा मुल्क, जो खुद आतंकवाद से परेशान होने का दावा करता है, वही दहशतगर्दों को सहूलियत और सरपरस्ती क्यों दे रहा है।

माहिरीन का कहना है कि यह बयान पाकिस्तान की उस पुरानी पॉलिसी को बेनक़ाब करता है जिसमें “अच्छे आतंकवादी” और “बुरे आतंकवादी” का फ़र्क पैदा कर कुछ गिरोहों को रणनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। कश्मीर से लेकर अफगान सरहद तक कई ऐसे तंजीमों के नाम सामने आते रहे हैं जिन्हें पाकिस्तानी इदारे कभी खुलकर रोकने में नाकाम रहे। अब अगर फौजी कियादत खुद दहशतगर्दों को बसाने और उन्हें मुआवज़ा देने की बात करे, तो इससे यह तसव्वुर और मजबूत होता है कि पाकिस्तान में आतंकवाद सिर्फ एक सुरक्षा मसला नहीं बल्कि स्टेट पॉलिसी का हिस्सा बन चुका है।

सियासी तबक़ों और सोशल मीडिया पर भी इस बयान के खिलाफ़ सख़्त रद्द-ए-अमल देखने को मिल रहा है। कई पाकिस्तानी अफराद सवाल उठा रहे हैं कि जब आम अवाम महंगाई, बेरोज़गारी और बदअमनी से जूझ रही है, तब दहशतगर्दों की “भलाई” के लिए रियासती संसाधन क्यों खर्च किए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि जिन हाथों ने मुल्क में खून-खराबा फैलाया, मासूमों की जान ली और पाकिस्तान की साख को नुकसान पहुँचाया, उन्हीं अनासिर को इनाम देना मुल्क के शहीदों और मुतास्सिरा खानदानों के साथ नाइंसाफी है।

दीगर जानकारों के मुताबिक, ऐसी पॉलिसियाँ पाकिस्तान के अंदरूनी अमन और इस्तेहकाम के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं। जब दहशतगर्द गिरोहों को यह एहसास हो कि उन्हें न सिर्फ पनाह मिलेगी बल्कि मुआवज़ा और सहूलियत भी दी जाएगी, तो इससे चरमपंथ को और हवा मिलती है। यही वजह है कि पाकिस्तान बार-बार आतंकवाद के दलदल से बाहर निकलने में नाकाम दिखाई देता है। बलोचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और कबायली इलाकों में बढ़ती हिंसा इस बात की गवाही देती है कि दहशतगर्दों के साथ नरमी की नीति ने हालात को और बिगाड़ा है।

दिफाई और सियासी माहिरीन का मानना है कि पाकिस्तान की फौजी कियादत ने बरसों से “स्ट्रैटेजिक एसेट” के तौर पर इस्तेमाल होने वाले गिरोहों को खत्म करने के बजाय उन्हें बचाने की कोशिश की। यही वजह है कि आज पाकिस्तान को दुनिया भर में आतंकवाद के मरकज़ के तौर पर देखा जाता है। अंतरराष्ट्रीय सतह पर भी पाकिस्तान की साख लगातार गिरती जा रही है और कई बार FATF जैसी संस्थाओं की निगरानी का सामना करना पड़ा।

नाज़रीन का कहना है कि अगर पाकिस्तान सच में अमन और तरक़्क़ी चाहता है, तो उसे दहशतगर्दों की हिमायत छोड़कर अवाम की सलामती और मुल्क के इस्तेहकाम को तरजीह देनी होगी। वरना दहशतगर्दों को पालने की यही पॉलिसी पाकिस्तान को अंदर से और कमजोर करती रहेगी और दुनिया में उसकी पहचान “दहशतगर्दी के मरकज़” के तौर पर और गहरी होती जाएगी।

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