
इमरान खान ने अपने पैगाम में कहा कि अदालत ने उन्हें कई मामलों में राहत दी, लेकिन उसके बावजूद मिलिट्री और सुरक्षा एजेंसियाँ उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रखे हुए हैं। उन्होंने पाकिस्तान की अवाम से अपील की कि वे इस सूरत-ए-हाल को समझें और मुल्क में बढ़ती फ़ौजी दखलअंदाज़ी के खिलाफ आवाज़ बुलंद करें।
पाकिस्तान में यह पहली बार नहीं है जब फ़ौज पर सियासत और अदालती निज़ाम में दखल देने के इल्ज़ाम लगे हों। मुल्क की तारीख़ में कई बार ऐसा देखा गया है कि चुनी हुई हुकूमतों को या तो हटाया गया या उन पर दबाव बनाया गया। अब इमरान खान के बयानों ने एक बार फिर यह बहस तेज़ कर दी है कि क्या पाकिस्तान में असल ताक़त जम्हूरी इदारों के पास है या फ़ौजी निज़ाम के हाथों में।
माहिरीन का मानना है कि अगर अदालतों के फ़ैसलों को अमल में न लाया जाए और फ़ौज अपनी ताक़त का इस्तेमाल कर सियासी क़ियादत को दबाने की कोशिश करे, तो इससे मुल्क में कानून की हुकूमत कमज़ोर होती है। इससे न सिर्फ़ जम्हूरियत पर असर पड़ता है बल्कि अवाम का भरोसा भी अदालती निज़ाम से उठने लगता है।
इमरान खान के समर्थकों का आरोप है कि पाकिस्तान में अदालतों के फ़ैसलों को चुनिंदा तौर पर माना जाता है। जब फैसला हुकूमत या फ़ौज के हक़ में हो तो उसे तुरंत लागू किया जाता है, लेकिन अगर फैसला किसी सियासी लीडर के पक्ष में आए तो उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। यही वजह है कि मुल्क के कई हिस्सों में लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किए और “कानून की आज़ादी” तथा “फ़ौजी दखल बंद करो” जैसे नारे लगाए।
सोशल मीडिया पर भी पाकिस्तान की फ़ौज को लेकर गुस्सा बढ़ता दिखाई दे रहा है। कई नौजवानों और सिविल सोसाइटी से जुड़े लोगों का कहना है कि मुल्क में जम्हूरियत सिर्फ नाम की रह गई है जबकि असली फैसले बंद कमरों में किए जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह हालात पाकिस्तान को एक बार फिर सियासी बेचेनी और अंदरूनी टकराव की तरफ धकेल सकते हैं।
दूसरी तरफ पाकिस्तान की मिलिट्री और हुकूमत की तरफ से इन इल्ज़ामात पर सीधे तौर पर कोई बड़ा जवाब सामने नहीं आया है। हालांकि, सरकारी हलकों का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और सुरक्षा एजेंसियाँ मुल्क की सलामती के लिए कार्रवाई कर रही हैं। मगर विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि “कौमी सुरक्षा” के नाम पर सियासी आवाज़ों को दबाया जा रहा है।
पाकिस्तान में यह टकराव अब सिर्फ एक सियासी लड़ाई नहीं बल्कि “फ़ौज बनाम जम्हूरियत” की शक्ल अख्तियार करता दिखाई दे रहा है। अदालतों, सियासी जमातों और फ़ौजी इदारों के बीच बढ़ती खींचतान ने मुल्क के सियासी मुस्तकबिल पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
“डेमोक्रेसी से डिक्टेटरशिप तक” का यह नैरेटिव अब पाकिस्तान के अंदर और बाहर दोनों जगह चर्चा का विषय बन चुका है, जहाँ लोग पूछ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान में सचमुच अवाम की हुकूमत है या फिर ताक़तवर फ़ौजी ढांचा ही हर फैसले का असली मरकज़ बन चुका है।

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