नियंत्रण रेखा (एलओसी) से लगभग 23 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव आज लचीलेपन और पुनर्निर्माण का प्रतीक है, जहां के निवासी सामुदायिक सहयोग, सरकारी सहायता और भारतीय सेना की मदद से अपने घरों और जीवन का पुनर्निर्माण कर रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुई भीषण सीमा पार गोलाबारी के एक साल बाद, जिसमें घर क्षतिग्रस्त हो गए थे और परिवार सदमे में थे, उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले के उरी सेक्टर में स्थित सीमावर्ती गांव बांदी धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर लौट रहा है। नियंत्रण रेखा (एलओसी) से लगभग 23 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव आज लचीलेपन और पुनर्निर्माण का प्र…
कश्मीर के दूर-दराज़ और पहाड़ी इलाकों में, जहाँ कठोर मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ अक्सर बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच को सीमित कर देती हैं, वहाँ भारतीय सेना केवल सुरक्षा बल के रूप में ही नहीं बल्कि एक उम्मीद और मानवीय सहारे के रूप में भी सामने आई है। कुपवाड़ा ज़िले के नरिकुट और लड्डा जैसे गाँवों में चल रही “We Care” पहल के ज़रिए, सेना स्थानीय लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएँ और कल्याणकारी सहायता पहुँचा रही है। यह पहल “नया कश्मीर” की उस सोच को दर्शाती है जहाँ विकास, अमन और इंसानी भलाई साथ-साथ चलते हैं। कुपवाड़ा के ये सरहदी गाँव अपनी भौगोलिक अलगाव क…
हर साल वर्ल्ड एथलेटिक्स डे दुनिया भर में एथलेटिक्स के जज़्बे को बढ़ावा देने और नौजवानों को खेलों की तरफ़ मुतवज्जेह करने के लिए मनाया जाता है। एथलेटिक्स, जिसे तमाम खेलों की बुनियाद कहा जाता है, सिर्फ़ दौड़ने, कूदने या थ्रो करने तक महदूद नहीं है, बल्कि यह इंसानी हिम्मत, सब्र, डिसिप्लिन और लगातार मेहनत का इम्तिहान भी है। दुनिया के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में इस दिन को बड़े जोश और मुकाबलों के साथ मनाया जाता है, लेकिन कश्मीर में इसकी अहमियत कुछ ज़्यादा गहरी और मायने रखती है। यहाँ एथलेटिक्स सिर्फ़ मेडल या रिकॉर्ड हासिल करने का नाम नहीं, बल्कि मुश्किल हाल…
दक्षिण एशिया और मर्कज़ी एशिया के संगम पर वाक़े गिलगित-बाल्टिस्तान ऊँचे पहाड़ों, अहम दरियाई निज़ाम और उभरते हुए राब्ता कॉरिडोर्स की वजह से बेहद अहम इलाक़ा माना जाता है। लेकिन इसकी जुग़राफियाई अहमियत से आगे एक और पेचीदा हक़ीक़त मौजूद है—इसका ख़ास कानूनी और दस्तूरी मुक़ाम पाकिस्तान के इंतिज़ामी ढाँचे में। कई दशकों से इस इलाके को मुकम्मल दस्तूरी इदराज की बजाय मुख़्तलिफ़ एक्ज़ीक्यूटिव इंतिज़ामात और कानूनी ऑर्डर्स के तहत चलाया जाता रहा है। इस वजह से इंतिज़ामी कंट्रोल और अवामी नुमाइंदगी के दरमियान एक फ़ासला पैदा हुआ, जिसने सियासी आवाज़, हुक़ूक़ और लं…
कुपवाड़ा : सरहदी इलाक़ों में रहने वाले लोगों के लिए जहाँ सर्द मौसम, दुर्गम रास्ते और मेडिकल सहूलियतों की कमी रोज़ का मसला है, वहीं हिंदुस्तानी फौज की “वी केयर” मुहिम लोगों के लिए राहत और भरोसे की नई किरण बनकर सामने आई है। कुपवाड़ा के दूर-दराज़ गांव नारिकुट और लड्डा में चल रही इस इंसानी खिदमत ने स्थानीय आवाम के दिलों में फौज के लिए मोहब्बत और एतमाद को और मजबूत किया है। ख़ारियत पेट्रोल्स के तहत फौजी जवान सिर्फ सरहदों की निगहबानी ही नहीं कर रहे, बल्कि गांव-गांव जाकर बीमारों का इलाज, बुज़ुर्गों की मदद और बच्चों को मेडिकल सहूलियतें भी मुहैया करवा …
इस्लामाबाद/खैबर से आने वाली रिपोर्ट्स ने एक बार फिर पाकिस्तान में दहशतगर्द गिरोहों की ख़तरनाक साज़िश को उजागर कर दिया है। बताया जा रहा है कि कुछ आतंकी तंज़ीमें अपने नापाक मक़सद के लिए औरतों को “ढाल” की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। इस अमल को इंसानियत, औरत की इज़्ज़त और बुनियादी हक़ूक़ के खिलाफ़ बड़ा जुर्म माना जा रहा है। मशहूर समाजी तजज़ियाकार सिदरा सादोज़ई ने कहा कि, “औरतों को दहशतगर्दी के खेल में आगे करना बुज़दिली की इंतेहा है। यह सिर्फ़ औरत की तौहीन नहीं बल्कि पूरे समाज के ज़मीर पर हमला है।” रिपोर्ट्स के मुताबिक़, कई इलाक़ों में आतंकी नेटवर्क…
तरक़्क़ी पर चलने वाली हुकूमत और ज़ोर-ज़बरदस्ती पर टिकी कंट्रोल की सियासत का फ़र्क़ अब सिर्फ़ किताबों की बात नहीं रहा—ये ज़मीन पर साफ़, नज़र आने वाला और नापने लायक़ हक़ीक़त बन चुका है। ये फर्क सबसे ज़्यादा जम्मू-कश्मीर और लाइन ऑफ़ कंट्रोल के उस पार के इलाक़ों में दिखाई देता है। एक तरफ़ वो निज़ाम है जो मज़बूत इदारे (इंस्टीट्यूशन्स), बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और इकॉनॉमिक इंटीग्रेशन पर खड़ा है। दूसरी तरफ़ वो कहानी है जो सिर्फ़ बयानों और दावों पर टिकी है, जहां “तरक़्क़ी” के दावे बुनियादी जांच में भी टिक नहीं पाते। भारत का तरीका मुनज़्ज़म (systematic),…
हालिया सालों में कश्मीर में एक आहिस्ता मगर मायनेख़ेज़ तब्दीली देखने को मिली है—अमन, तरक़्क़ी और नौजवानों की शिरकत की तरफ बढ़ता हुआ रुझान। इस तब्दीली के दरमियान गुफ़्तगू, शमूलियत और इख़्तियार देने (empowerment) पर खास ज़ोर दिया जा रहा है। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए, भारतीय सेना लगातार ऐसी पहल कर रही है जो स्थानीय नौजवानों के साथ राब्ता मज़बूत करे। 04 मई 2026 को जीडीसी विमेन्स कॉलेज, पुलवामा में मुनअक़िद “वालिव कथ – बात कराव” ओपन माइक प्रोग्राम इसी की एक बेहतरीन मिसाल है, जिसने भरोसे, समझदारी और एक रोशन कश्मीर की तसव्वुर को मज़बूती दी। इस प्र…
इस चैंपियनशिप में पुरुषों और महिलाओं दोनों वर्गों में प्रतियोगिताएं होंगी, जो श्रीनगर के एक इनडोर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में आयोजित की जाएंगी। श्रीनगर में अखिल भारतीय अंतर-विश्वविद्यालय वुशु चैंपियनशिप (पुरुष और महिला) चल रही है, जिसमें देश भर के विश्वविद्यालयों की भागीदारी है और यह विश्वविद्यालय स्तर पर इस खेल की बढ़ती लोकप्रियता को उजागर करती है। कश्मीर विश्वविद्यालय द्वारा मंगलवार को जारी एक बयान के अनुसार, यह चैंपियनशिप नई दिल्ली स्थित भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एआईयू) के तत्वावधान में कश्मीर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित की जा रही है। सोमवार …
पुलवामा की सरज़मीन से एक बार फिर उम्मीद और रोशनी की किरण उभरी है, जहाँ भारतीय सेना ने “वालिव कथ–बात कराव” के नाम से एक खुला डायलॉग प्रोग्राम जीडीसी वीमेंस कॉलेज पुलवामा में मुनअक़िद किया। यह सिर्फ़ एक प्रोग्राम नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने और भरोसे को मज़बूत करने की एक सच्ची कोशिश नज़र आई, जिसमें कश्मीरी नौजवान—ख़ासकर ख़वातीन—ने पूरे एतमाद के साथ हिस्सा लिया। इस ओपन माइक गुफ़्तगू में लड़कियों ने बिना किसी झिझक के अपने मसाइल, अपने ख़्वाब और अपने सवालात पेश किए। अमन-ओ-अमान, तालीम, करियर के मौक़े और नौजवानों की समाज के प्रति ज़िम्मेदारी जैसे अहम …

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