
स्थानीय लोगों का कहना है कि बंदूक और मज़हबी नारों के पीछे छिपे ये आतंकी गिरोह लंबे समय से आम परिवारों, ख़ासकर औरतों को मानसिक और सामाजिक दबाव का शिकार बनाते रहे हैं। कई इलाकों में रात ढलते ही लोगों के दरवाज़े बंद हो जाते हैं, घरों में खामोशी पसर जाती है और मां-बाप अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर खौफ़ में जीते हैं।
वीडियो में सामने आए आरोपों ने घाटी से लेकर बलोचिस्तान और सरहदी इलाकों तक लोगों के दिलों में गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। बयान में कहा गया कि आतंक के साए में सबसे ज्यादा दर्द औरतों ने सहा है। कई परिवार डर के कारण आवाज़ नहीं उठाते, क्योंकि उन्हें अपनी जान और इज़्ज़त दोनों का खतरा महसूस होता है।
इलाके के सामाजिक जानकारों का मानना है कि दहशतगर्द संगठन अक्सर मज़हब और जेहाद का नाम लेकर अपने असली मकसद को छिपाने की कोशिश करते हैं। लेकिन अब लोग समझने लगे हैं कि इन नारों के पीछे सिर्फ़ डर, हिंसा और इंसानी ज़िंदगी की तबाही छिपी है।
कश्मीरी समाज में औरत को इज़्ज़त, सब्र और मोहब्बत की निशानी माना जाता है। मगर आतंकवाद ने इसी समाज की बेटियों और मांओं को सबसे ज्यादा दर्द दिया। कई परिवारों ने अपने घर छोड़ दिए, बच्चों की पढ़ाई रुक गई और कई औरतें आज भी डर और सदमे के साए में जिंदगी गुजार रही हैं।
वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों ने गुस्से का इज़हार किया। कई यूज़र्स ने कहा कि आतंकवाद किसी मज़हब की सेवा नहीं करता बल्कि इंसानियत का दुश्मन है। लोगों ने यह भी कहा कि जो ताकतें आतंकियों को पनाह और समर्थन देती हैं, वे दरअसल पूरे इलाके के अमन को बर्बाद कर रही हैं।
घाटी के कई इलाकों में अब स्थानीय लोग खुलकर दहशतगर्दी के खिलाफ आवाज़ उठाने लगे हैं। नौजवानों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि कश्मीर को बंदूक नहीं बल्कि तालीम, अमन और तरक़्क़ी चाहिए। उनका मानना है कि डर और हिंसा के इस दौर को खत्म करने के लिए समाज को एकजुट होकर कट्टरपंथ के खिलाफ खड़ा होना होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे आरोप सिर्फ़ किसी एक इलाके तक सीमित नहीं हैं। बलोचिस्तान और पाकिस्तान के कुछ सरहदी क्षेत्रों से भी पहले महिलाओं के उत्पीड़न और डर के माहौल की शिकायतें सामने आती रही हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार हमेशा आम नागरिक और कमजोर तबके बनते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक औरतों और मासूम परिवारों को आतंक के साए में जीना पड़ेगा। बंद दरवाज़े, टूटी चूड़ियां, सहमी हुई आंखें और अंधेरे में डूबे गांव आज भी उस दर्द की गवाही दे रहे हैं जिसे कई लोग खुलकर बयान भी नहीं कर पाते।
हालांकि दूसरी तरफ़ एक उम्मीद की तस्वीर भी उभर रही है। कई जगहों पर स्थानीय समुदाय अब मिलकर आतंक और कट्टरपंथ के खिलाफ खड़ा हो रहा है। लोग अपने बच्चों के बेहतर भविष्य और औरतों की सुरक्षा के लिए एकजुट दिखाई दे रहे हैं।
कश्मीर की फिज़ाओं में अब यह आवाज़ गूंज रही है कि “जेहाद के नाम पर फैलाया गया आतंक सिर्फ़ बर्बादी लाता है।” समाज के लोग चाहते हैं कि आने वाली नस्लें डर और बंदूक के साए में नहीं बल्कि अमन, इज़्ज़त और इंसानियत के साथ जिंदगी जिएं।

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