
स्कॉलर ने कहा कि “आप लोग सस्ती बिजली के लिए सड़कों पर निकले, ये आपका हक़ है… लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि जिस ज़मीन पर आप रहते हैं, वहाँ फैसले कौन करता है? क्या आपकी आवाज़ को सच में अहमियत दी जाती है? अगर नहीं, तो फिर यह कैसी आज़ादी है?” उनके इस बयान ने पीओके में बढ़ती बेचैनी और पाकिस्तान के खिलाफ गुस्से को नई बहस में बदल दिया है।
ख़िताब के दौरान स्कॉलर ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान लंबे अरसे से पीओके के संसाधनों, पानी, बिजली और ज़मीन का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करता आया है, जबकि स्थानीय लोगों को बुनियादी सहूलतों तक के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि “इस्लामाबाद सिर्फ आपके संसाधनों से फायदा उठाता है, मगर आपके बच्चों को तालीम, रोजगार और इंसाफ नहीं देता। आपको सिर्फ इस्तेमाल किया जा रहा है।”
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही वीडियो में बड़ी तादाद में लोग स्कॉलर की बातों को ध्यान से सुनते दिखाई दे रहे हैं। कई जगहों पर “आज़ादी”, “हक़ दो” और “ज़ुल्म बंद करो” जैसे नारों के पोस्टर और बैनर भी नज़र आए। स्थानीय एक्टिविस्ट्स और युवाओं के बीच यह चर्चा तेज़ हो गई है कि पीओके की आवाम को अब सिर्फ आर्थिक मसलों पर नहीं बल्कि अपने राजनीतिक और इंसानी हुकूक़ के लिए भी आवाज़ उठानी चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान पाकिस्तान के लिए चिंता का सबब बन सकते हैं, क्योंकि पीओके में पहले से ही महंगाई, बेरोज़गारी और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर नाराज़गी बढ़ रही है। हाल के महीनों में कई प्रदर्शन और विरोध मार्च भी देखे गए, जहाँ लोगों ने इस्लामाबाद की नीतियों पर सवाल उठाए।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज़ कर दी है कि क्या पीओके की जनता खुद को वास्तव में आज़ाद महसूस करती है या फिर वे राजनीतिक और आर्थिक दबाव के नीचे जी रही है। स्कॉलर का यह संदेश अब एक बड़े नैरेटिव का हिस्सा बनता दिख रहा है “जागो पीओके — असली आज़ादी की लड़ाई लड़ो”
वीडियो और विज़ुअल्स में स्कॉलर की तकरीर, जागरूक होती जनता, विरोध प्रदर्शन, और आज़ादी के प्रतीकों को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है। यह नैरेटिव लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि पीओके की जनता को अपने हकों, पहचान और असली आज़ादी के लिए आवाज़ बुलंद करनी चाहिए।

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