क्राफ्ट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट, श्रीनगर की निगरानी में ये दोनों प्रशिक्षण कार्यक्रम दो-दो महीने की अवधि के होंगे। इनमें बारामूला में ग्लेज्ड पॉटरी और श्रीनगर में कॉपरवेयर यानी कंदकारी की ट्रेनिंग दी जाएगी। दोनों कार्यक्रमों में 30-30 दस्तकारों को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है। इस तरह कुल 60 दस्तकारों को अपने पारंपरिक हुनर को सीखने, सँवारने और आगे बढ़ाने का मौक़ा मिलेगा।
कश्मीर की दस्तकारी सिर्फ रोज़गार का ज़रिया नहीं, बल्कि यहाँ की तहज़ीब, रवायत और सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा रही है। पीढ़ियों से स्थानीय दस्तकार अपने हाथों की मेहनत और हुनर से ऐसे उत्पाद तैयार करते आए हैं, जिनमें कश्मीर की पहचान और स्थानीय कला की झलक दिखाई देती है। मगर बदलते बाज़ार और मशीन से तैयार होने वाले सस्ते सामान की बढ़ती मौजूदगी ने इन पारंपरिक हुनरों के सामने कई मुश्किलें पैदा की हैं।
खास तौर पर ग्लेज्ड पॉटरी और कॉपरवेयर कंदकारी जैसे हुनरों को लगातार नए दस्तकारों की ज़रूरत है। अगर अनुभवी उस्तादों से सीखने वाले शागिर्दों की तादाद कम होती गई, तो इन हुनरों से जुड़ा बारीक इल्म और पारंपरिक तकनीक आने वाली नस्लों तक पहुँचाना मुश्किल हो सकता है। इसी चुनौती को देखते हुए गुरु-शिष्य मॉडल को अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसमें उस्ताद दस्तकार अपने तजुर्बे और हुनर को सीधे नई पीढ़ी के शागिर्दों तक पहुँचाते हैं।
गुरु-शिष्य हस्तशिल्प मॉडल की बुनियाद ही इस सोच पर है कि किसी हुनर को महज़ किताब या मशीन के जरिए नहीं, बल्कि उसे बरसों से निभा रहे माहिर दस्तकार से सीखना चाहिए। इस प्रक्रिया में शागिर्द को काम की बारीकियों, पारंपरिक तरीकों और हुनर से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी हासिल करने का मौक़ा मिलता है। इससे न सिर्फ दस्तकारी की गुणवत्ता बरकरार रखने में मदद मिलती है, बल्कि स्थानीय हुनर के लिए नई पीढ़ी भी तैयार होती है।
बारामूला में ग्लेज्ड पॉटरी और श्रीनगर में कंदकारी के लिए होने वाले ये प्रशिक्षण कार्यक्रम इसी सिलसिले की एक कड़ी हैं। 30-30 दस्तकारों को प्रशिक्षण दिए जाने से उम्मीद है कि पारंपरिक हुनर को आगे बढ़ाने के लिए नए हाथ तैयार होंगे। यह पहल उन स्थानीय कारीगरों के लिए भी अहम है जो अपने हुनर को रोज़गार के साथ जोड़कर आगे बढ़ाना चाहते हैं।
कश्मीर में पारंपरिक दस्तकारी की बहाली का मसला सिर्फ पुराने हुनर को बचाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ स्थानीय दस्तकारों की रोज़ी-रोटी, हुनर की इज़्ज़त और आने वाली नस्लों के लिए सांस्कृतिक विरासत को महफूज़ रखने का सवाल भी जुड़ा हुआ है। मशीन से बने सस्ते सामान के दौर में हाथ से तैयार किए गए उत्पादों की पहचान बनाए रखना दस्तकारों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
ऐसे में गुरु-शिष्य मॉडल के तहत होने वाले प्रशिक्षण को पारंपरिक हुनर और नई पीढ़ी के बीच एक पुल के तौर पर देखा जा सकता है। उस्तादों का तजुर्बा शागिर्दों तक पहुँचेगा और शागिर्द अपने हुनर को बदलते दौर के साथ आगे ले जाने की कोशिश करेंगे। इससे कश्मीर की पुरानी दस्तकारी में नई जान डालने की राह खुल सकती है।
केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय की ओर से मंजूर 14.90 लाख रुपये की यह सहायता इसी कोशिश को सहारा देती है। ग्लेज्ड पॉटरी और कंदकारी जैसे हुनरों को प्रशिक्षण के ज़रिए आगे बढ़ाने से स्थानीय दस्तकारों के हुनर को नई पहचान देने की कोशिश की जा रही है। कश्मीर की दस्तकारी की यह रवायत तभी ज़िंदा रह सकती है जब उस्तादों का हुनर शागिर्दों तक पहुँचे और नई पीढ़ी इसे अपनी रोज़ी-रोटी तथा अपनी तहज़ीब का हिस्सा बनाकर आगे बढ़ाए।


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