झेलम की सफाई के लिए आगे आए नयीम फारूक, बरामूला में चलाया सफाई अभियान


बरामूला में सामाजिक कार्यकर्ता नयीम फारूक ने दरिया-ए-झेलम की सफाई और इसके संरक्षण को लेकर एक मुहिम शुरू की। झेलम के किनारे चलाए गए इस सफाई अभियान के दौरान कचरा हटाया गया और लोगों में दरिया को साफ-सुथरा रखने के हवाले से जागरूकता पैदा करने की कोशिश की गई। इस पहल का मकसद सिर्फ दरिया के किनारों से कचरा हटाना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों को यह एहसास दिलाना भी रहा कि कुदरती जलस्रोतों की हिफाजत हर शहरी और समाज की साझा जिम्मेदारी है।

सफाई मुहिम के दौरान नयीम फारूक ने झेलम में कचरा डालने से परहेज करने की अपील की। उन्होंने लोगों से कहा कि दरिया को महज पानी का एक बहाव समझने के बजाय कश्मीर की कुदरती विरासत के तौर पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगर लोग अपने रोजमर्रा के व्यवहार में थोड़ी-सी जिम्मेदारी का मुजाहिरा करें और कचरे को दरिया में फेंकने से बचें, तो झेलम को साफ रखने की कोशिशों को काफी मजबूती मिल सकती है।

बरामूला में हुई यह पहल नागरिक जिम्मेदारी और सामुदायिक भागीदारी की अहमियत को भी सामने लाती है। दरिया के किनारे सफाई अभियान चलाकर लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की गई कि पर्यावरण की हिफाजत केवल सरकारी विभागों या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें स्थानीय अवाम की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। जब समाज के लोग खुद आगे आकर अपने आसपास के माहौल को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं, तो ऐसी मुहिम ज्यादा असरदार बन सकती है।

कश्मीर के लिए झेलम की अहमियत किसी से पोशीदा नहीं है। दरिया-ए-झेलम घाटी की कुदरती पहचान का एक अहम हिस्सा है और इसके आसपास रहने वाली आबादी के साथ इसका गहरा रिश्ता रहा है। ऐसे में दरिया में कचरा डालने की आदत पर रोक लगाना और इसके किनारों को साफ रखना सामूहिक जिम्मेदारी का हिस्सा बनता है। नयीम फारूक की ओर से शुरू की गई सफाई मुहिम इसी सोच को लोगों तक पहुंचाने की एक कोशिश के तौर पर सामने आई।

इस मुहिम के जरिए यह पैगाम भी दिया गया कि सफाई केवल एक दिन या किसी अभियान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके लिए लगातार जागरूकता और जिम्मेदार नागरिक व्यवहार जरूरी है। अगर स्थानीय लोग अपने घरों और आसपास के इलाकों से निकलने वाले कचरे को सही तरीके से निपटाने पर ध्यान दें और उसे झेलम या उसके किनारों पर न डालें, तो दरिया की सफाई और हिफाजत में अहम मदद मिल सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ता की यह पहल इस बात को उजागर करती है कि छोटे स्तर पर उठाया गया एक कदम भी सामुदायिक चेतना पैदा कर सकता है। बरामूला में झेलम के किनारे सफाई अभियान ने अवाम को अपने कुदरती माहौल के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराने की कोशिश की। दरिया को साफ रखना सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा मसला नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए कश्मीर की कुदरती विरासत को महफूज रखने का भी सवाल है।

नयीम फारूक ने लोगों से सामूहिक तौर पर इस मुहिम का हिस्सा बनने और झेलम को कचरे से महफूज रखने की अपील की। उनकी पहल ने यह साफ किया कि दरिया की हिफाजत के लिए सरकारी कोशिशों के साथ-साथ अवाम की जागरूकता और रोजमर्रा की जिम्मेदारियां भी बेहद अहम हैं। झेलम की सफाई का यह पैगाम बरामूला  से आगे पूरे कश्मीर में नागरिक जिम्मेदारी और कुदरती माहौल की हिफाजत की सोच को मजबूत करने की जरूरत को सामने लाता है।

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