बीबीसी ने सिमरन इरशाद की इस पहल को अपनी एक रिपोर्ट में जगह दी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि डल झील से निकाला जाने वाला खरपतवार आम तौर पर बेकार समझकर अलग कर दिया जाता है। सिमरन ने इसी सामग्री में एक नई संभावना तलाश की और इसे अपने दस्तकारी के काम में इस्तेमाल करना शुरू किया। इस तरह झील से निकाला जाने वाला कुछ जैविक कचरा अब उनके लिए एक उपयोगी कार्यशाला सामग्री में तब्दील हो रहा है।
सिमरन का यह काम महज़ एक दस्तकारी प्रयोग नहीं, बल्कि कश्मीर के सामने मौजूद दो अहम पहलुओं को एक-दूसरे से जोड़ता है। एक तरफ डल झील में बढ़ता खरपतवार और प्रदूषण चिंता का सबब है, तो दूसरी तरफ कश्मीर की सदियों पुरानी पेपर-माशे दस्तकारी अपनी पहचान और बाज़ार को बरकरार रखने की कोशिश कर रही है। सिमरन का प्रयास इन दोनों के बीच एक रचनात्मक रास्ता तलाश करता दिखाई देता है।
कश्मीर में पेपर-माशे को लंबे अरसे से पारंपरिक कला और दस्तकारी की अहम विरासत माना जाता है। इस कला में कारीगर अपनी मेहनत, हुनर और बारीकी से साधारण सामग्री को खूबसूरत सजावटी वस्तुओं में बदलते हैं। सिमरन ने इसी परंपरा के साथ पर्यावरण से जुड़ी एक नई सोच को जोड़ने की कोशिश की है। डल झील से निकली सामग्री को अपने काम में शामिल करके वह यह दिखा रही हैं कि जिसे एक जगह बेकार समझा जाता है, उसमें किसी दूसरी जगह उपयोगी संसाधन की संभावना हो सकती है।
इस पहल का एक अहम पहलू महिला सशक्तीकरण भी है। श्रीनगर की एक महिला दस्तकार के तौर पर सिमरन ने अपने हुनर को पर्यावरणीय सोच के साथ जोड़ा है। उनका काम कश्मीर की उन महिलाओं के लिए भी एक मिसाल बन सकता है, जो स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक हुनर और नए विचारों को जोड़कर अपने लिए रोज़गार और पहचान के रास्ते तलाश कर रही हैं।
डल झील कश्मीर के पर्यटन और स्थानीय ज़िंदगी का अहम हिस्सा है। झील की सफाई के दौरान निकाले जाने वाले खरपतवार को सिर्फ़ अपशिष्ट मानने के बजाय उसके संभावित उपयोग पर गौर करना संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में एक विचार पेश करता है। हालांकि, ऐसे प्रयोग डल झील की सफाई या प्रदूषण की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं हैं, लेकिन वे यह ज़रूर दिखाते हैं कि पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच स्थानीय स्तर पर रचनात्मक समाधान तलाशे जा सकते हैं।
सिमरन इरशाद की कहानी इस मायने में भी अहम है कि इसमें कश्मीर की पुरानी दस्तकारी और नए दौर की पर्यावरणीय सोच एक साथ नज़र आती है। डल झील से निकला खरपतवार, जो कभी महज़ एक समस्या और कचरे के तौर पर देखा जाता था, अब उनके हाथों में एक नए शिल्प-सफर का हिस्सा बन रहा है। यह पहल कश्मीर की दस्तकारी में नए प्रयोगों, महिलाओं की भागीदारी और स्थानीय संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की एक दिलचस्प तस्वीर पेश करती है।


0 टिप्पणियाँ