कुपवाड़ा की सरहदी बेटियों के हाथों में तिरंगा, 140 महिलाओं को मिला रोज़गार और आत्मनिर्भरता का सहारा


कुपवाड़ा की सरहदी वादी में तिरंगे की शान अब सिर्फ़ राष्ट्रीय गौरव की निशानी नहीं, बल्कि स्थानीय महिलाओं के लिए रोज़गार, हुनर और आत्मनिर्भरता का ज़रिया भी बन रही है। नियंत्रण रेखा (एलओसी) के नज़दीक रहने वाली कुपवाड़ा की करीब 140 महिलाएं भारतीय सेना के सहयोग से तिरंगे की सिलाई और निर्माण से जुड़कर अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आर्थिक मजबूती की नई राह बना रही हैं। दूरदराज़ और सरहदी इलाकों में रहने वाले परिवारों के लिए यह पहल इस बात की मिसाल बन रही है कि हुनर को रोज़गार से जोड़कर महिलाओं को न सिर्फ़ आर्थिक रूप से मज़बूत बनाया जा सकता है, बल्कि उनके आत्मविश्वास और सामाजिक सम्मान को भी नई बुलंदी दी जा सकती है।

कुपवाड़ा में ‘फ्लैग वुमन ऑफ कुपवाड़ा’ नाम से शुरू की गई सहकारी पहल अप्रैल 2022 में अस्तित्व में आई थी। इसके बाद इस मुहिम ने धीरे-धीरे अपना दायरा बढ़ाया और आज जिले के अलग-अलग हिस्सों में 12 कौशल केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों के ज़रिये महिलाओं को सिलाई से जुड़े हुनर को निखारने और उसे आमदनी के साधन में बदलने का अवसर मिल रहा है। तिरंगे की सिलाई जैसे काम से जुड़ना इन महिलाओं के लिए महज़ एक रोज़गार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय ध्वज के साथ एक भावनात्मक रिश्ता भी कायम करता है। सरहद के पास रहने वाली इन महिलाओं के हाथों से तैयार होने वाला तिरंगा उनके अपने परिवारों की आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने के साथ-साथ मुल्क के प्रति उनके जज़्बे और जिम्मेदारी का भी प्रतीक बन रहा है।

इस पहल का सबसे अहम पहलू यह है कि इसके केंद्रों से जुड़ी महिलाओं को अपने घर और परिवार की जिम्मेदारियों के साथ काम करने का अवसर मिल रहा है। सरहदी इलाकों में रोज़गार के सीमित अवसरों के बीच महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर काम की व्यवस्था होना परिवारों के लिए एक बड़ी सहूलियत है। इससे उन्हें रोज़गार की तलाश में दूर-दराज़ इलाकों का रुख करने की जरूरत कम होती है और वे अपने घर-परिवार के साथ रहते हुए अपनी आमदनी में योगदान दे सकती हैं। 140 महिलाओं का इस मुहिम से जुड़ना कुपवाड़ा की ग्रामीण और सरहदी आबादी में महिला सशक्तीकरण की एक अहम तस्वीर पेश करता है।

भारतीय सेना और स्थानीय समुदायों के बीच लंबे समय से चल रही जनकल्याणकारी गतिविधियों में शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और कौशल विकास जैसी पहल शामिल रही हैं। कुपवाड़ा में तिरंगा तैयार करने वाली महिलाओं की यह मुहिम उसी सिलसिले को रोज़गार और आत्मनिर्भरता से जोड़ती है। खास तौर पर उन परिवारों के लिए, जो नियंत्रण रेखा के नज़दीक कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीवन गुज़ारते हैं, ऐसे अवसर उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकते हैं। महिला के हाथ में हुनर और अपनी कमाई का साधन होने से पूरे परिवार में आर्थिक फैसलों और भविष्य की योजनाओं में उसकी भूमिका मजबूत होती है।

कुपवाड़ा की इन महिलाओं की कहानी वादी के दूसरे दूरदराज़ इलाकों के लिए भी एक प्रेरक मिसाल बन सकती है। यह पहल दिखाती है कि स्थानीय हुनर, संस्थागत सहयोग और बाज़ार से जुड़ाव मिलकर सरहदी क्षेत्रों में नए रोज़गार के रास्ते खोल सकते हैं। तिरंगे की सिलाई से जुड़ी ये महिलाएं एक तरफ़ अपने परिवारों की आमदनी में हाथ बंटा रही हैं, तो दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय ध्वज को अपने हुनर से आकार देकर अपने जज़्बात का इज़हार भी कर रही हैं।

कुपवाड़ा की सरहदी वादी में महिलाओं की यह सरगर्मी इस बात का पैग़ाम देती है कि तरक़्क़ी की राह में सरहद और मुश्किल हालात रुकावट नहीं बन सकते। जब हुनर को सही मंच और सहयोग मिलता है, तो वही हुनर रोज़गार, इज़्ज़त और आत्मनिर्भरता में तब्दील हो जाता है। तिरंगे की सिलाई कर रही ये 140 महिलाएं आज अपने परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बनने के साथ-साथ कुपवाड़ा की नई तस्वीर भी पेश कर रही हैं—एक ऐसी तस्वीर, जिसमें सरहद के करीब रहने वाली बेटियां अपने हाथों के हुनर से अपने भविष्य को खुद संवार रही हैं। 

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