कुपवाड़ा, जम्मू-कश्मीर: नियंत्रण रेखा (LoC) के क़रीब बसे केरन इलाक़े के दो सरकारी स्कूलों में भारतीय सेना और रूबल नागी आर्ट फ़ाउंडेशन की जानिब से कंप्यूटर मुहैया कराए गए हैं। इस पहल को सरहदी इलाक़ों में तालीमी बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने और नौजवान तलबा को डिजिटल दौर के साथ जोड़ने की एक अहम कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। यह क़दम वादी में तालीम, तरक़्क़ी और डिजिटल इख़्तियारसाज़ी की दिशा में एक और अहम पड़ाव माना जा रहा है।
भारतीय सेना और रूबल नागी आर्ट फ़ाउंडेशन के इस मुश्तरका (संयुक्त) इदारे ने केरन के दो सरकारी स्कूलों को आधुनिक कंप्यूटर उपलब्ध कराकर उन बच्चों के लिए नई उम्मीदों के दरवाज़े खोले हैं, जो लंबे अरसे से सीमित संसाधनों के बावजूद बेहतर तालीम हासिल करने की कोशिश कर रहे थे। अब इन स्कूलों के तलबा को डिजिटल तालीम, कंप्यूटर की बुनियादी मालूमात और तकनीकी हुनर सीखने का बेहतर मौक़ा मिलेगा।
सरहदी इलाक़ों के बच्चों के लिए आधुनिक तकनीक तक रसाई (पहुँच) हमेशा एक बड़ा चैलेंज रही है। बेहतर इंटरनेट, डिजिटल लैब और कंप्यूटर जैसी सहूलियतों की कमी की वजह से अक्सर इन इलाक़ों के विद्यार्थी शहरों के मुकाबले पीछे रह जाते हैं। ऐसे में यह पहल सिर्फ़ कंप्यूटर देने तक महदूद नहीं, बल्कि उन्हें डिजिटल दुनिया से जोड़ने की एक अहम कोशिश है, जिससे उनकी तालीमी सलाहियतों में इज़ाफ़ा होगा और भविष्य में रोज़गार व उच्च शिक्षा के नए रास्ते भी खुलेंगे।
तालीम के माहिरों का मानना है कि मौजूदा दौर में डिजिटल इल्म किसी भी तलबा की कामयाबी के लिए बेहद ज़रूरी है। कंप्यूटर की जानकारी अब सिर्फ़ एक अतिरिक्त हुनर नहीं, बल्कि पढ़ाई, रोज़गार और पेशेवर ज़िंदगी का बुनियादी हिस्सा बन चुकी है। केरन जैसे दूरदराज़ सरहदी इलाक़े में इस तरह की सहूलियतों का पहुँचना इस बात की निशानी है कि तालीमी तरक़्क़ी अब शहरों तक महदूद नहीं रही, बल्कि इसका दायरा सीमावर्ती इलाक़ों तक भी वुसअत (विस्तार) पा रहा है।
भारतीय सेना पिछले कई बरसों से जम्मू-कश्मीर के दूरदराज़ इलाक़ों में सिर्फ़ अमन व अमान की ज़िम्मेदारी ही नहीं निभा रही, बल्कि तालीम, सेहत, खेल, हुनरमंदी और बुनियादी सहूलियतों से जुड़े कई अवामी प्रोग्राम भी चला रही है। स्कूलों की मरम्मत, स्टडी सेंटर, लाइब्रेरी, मेडिकल कैंप, खेल मुकाबले और स्किल डेवलपमेंट जैसी कई पहलें स्थानीय नौजवानों के लिए नए मौक़े पैदा कर रही हैं। केरन के स्कूलों को कंप्यूटर मुहैया कराना भी इन्हीं अवाम-दोस्त कोशिशों का हिस्सा है।
रूबल नागी आर्ट फ़ाउंडेशन भी मुल्क के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में तालीम और समाजी बहबूदी (सामाजिक विकास) के लिए लगातार काम कर रहा है। भारतीय सेना के साथ मिलकर की गई यह पहल यह दिखाती है कि जब सरकारी और समाजी इदारे मिलकर काम करते हैं, तो दूरदराज़ इलाक़ों तक भी तरक़्क़ी की रौशनी पहुँच सकती है।
स्थानीय लोगों और वालिदैन ने इस क़दम का ख़ैरमक़दम करते हुए उम्मीद ज़ाहिर की कि इससे बच्चों का तालीम में दिलचस्पी और डिजिटल सीखने का शौक़ बढ़ेगा। उनका कहना है कि नई तकनीक से वाक़िफ़ होकर सरहदी इलाक़ों के बच्चे भी मुल्क के दूसरे हिस्सों के विद्यार्थियों की तरह मुक़ाबला करने के क़ाबिल बनेंगे।
यह पहल इस बात की मिसाल है कि जम्मू-कश्मीर में तालीम और डिजिटल तरक़्क़ी को मज़बूत बनाने के लिए लगातार कोशिशें जारी हैं। सरहदी इलाक़ों के बच्चों को आधुनिक संसाधनों से जोड़कर उन्हें बेहतर मुस्तक़बिल (भविष्य) की तरफ़ बढ़ने का मौक़ा दिया जा रहा है।
तालीम, तकनीक और तरक़्क़ी का यह संगम इस हक़ीक़त को मज़बूत करता है कि जम्मू-कश्मीर का नया सफ़र इल्म, डिजिटल इख़्तियार और नौजवानों की तरक़्क़ी के ज़रिए आगे बढ़ रहा है।

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