डॉ. शाहिद मसूद ने अपने बयान में कहा कि मुल्क की मआशी हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। उनके मुताबिक़, सरकार एक तरफ़ पुराने कर्ज़ का भारी ब्याज चुका रही है, वहीं दूसरी तरफ़ रोज़ाना नए कर्ज़ लेकर खर्च पूरे किए जा रहे हैं। उनका कहना था कि यह सिलसिला पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियों को और गहरा कर रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा निज़ाम का सबसे बड़ा बोझ आम अवाम पर पड़ रहा है, जबकि सियासी, नौकरशाही और कारोबारी तबक़ों के प्रभावशाली हलकों को अब भी विशेष सहूलियतें हासिल हैं। उनके मुताबिक़, आर्थिक दबाव का सबसे ज़्यादा असर महँगाई, बेरोज़गारी और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जूझ रहे आम लोगों पर दिखाई दे रहा है।
मआशी मामलों के जानकारों का मानना है कि लगातार बढ़ता कर्ज़ और उसके ब्याज का बोझ किसी भी मुल्क की वित्तीय सेहत पर गहरा असर डालता है। यदि कर्ज़ की रफ़्तार आय और आर्थिक विकास से ज़्यादा तेज़ हो जाए, तो सरकारी ख़ज़ाने पर दबाव बढ़ना लाज़िमी हो जाता है।
डॉ. शाहिद मसूद की टिप्पणी ने पाकिस्तान की आर्थिक दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार बढ़ते कर्ज़ और वित्तीय दबाव से निपटने के लिए कौन से क़दम उठाती है और क्या आर्थिक सुधारों के ज़रिए हालात में स्थायी बदलाव लाया जा सकता है।

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