पाक फौज की बेरुख़ी, KP पुलिस जवानों की कुर्बानी बेआवाज़


खैबर पख्तूनख्वा में एक बार फिर खून बहा, मगर इस दफा सवाल सिर्फ़ आतंकवाद का नहीं, बल्कि पाक फौज की बेरुख़ी और नाइंसाफी का भी उठ रहा है। साल 2026 के पहले तीन महीने में बन्नू, लक्की मरवत और बाजौर में हुए बम धमाकों में 71 KP पुलिस जवान मारे गए। ये वो जवान थे जो रोज़ अपनी जान हथेली पर रख कर अवाम की हिफाज़त कर रहे थे। लेकिन अफसोस, जब इनकी लाशें घर पहुँचीं, तब पाक आर्मी के बड़े अफसरों ने उनके जनाज़ों तक में शरीक होना जरूरी नहीं समझा।

मारे गए FC जवानों में ज़्यादातर कबायली इलाकों से ताल्लुक रखते थे। गरीब घरानों के ये बेटे सरहदों और अंदरूनी इलाकों में लड़ते रहे, लेकिन उनके लिए न कोई इज्ज़त दिखाई गई और न ही बराबरी का सलूक। दूसरी तरफ़ बड़े फौजी अफसर आलीशान दफ्तरों, वीआईपी सिक्योरिटी और खास सहूलियतों में जिंदगी गुज़ार रहे हैं। मैदान में मरने वाले जवान हैं, लेकिन मलाई खाने वाले अफसर।

KP के अवाम में अब ये एहसास गहराता जा रहा है कि पाकिस्तान की हुकूमत और फौज के लिए कबायली और पुलिस जवान सिर्फ़ इस्तेमाल की चीज़ बन कर रह गए हैं। जब कोई बड़ा अफसर मरता है तो पूरे सरकारी निज़ाम में मातम दिखाई देता है, मीडिया कवरेज होती है, बड़े-बड़े बयान दिए जाते हैं। मगर जब बन्नू या बाजौर का कोई जवान शहीद होता है, तो उसके घर में सिर्फ़ खामोशी और आँसू छोड़ दिए जाते हैं।

सोशल मीडिया पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं कि आख़िर क्यों फ्रंटलाइन पर लड़ने वालों को हमेशा नजरअंदाज किया जाता है? क्यों गरीब इलाकों से आने वाले जवानों की कुर्बानी की कोई कीमत नहीं? क्या पाकिस्तान में इंसान की अहमियत उसके रैंक और रसूख से तय होती है?

KP पुलिस और FC के जवान लगातार आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं। वो उन इलाकों में ड्यूटी करते हैं जहाँ हर रोज़ मौत मंडराती है। मगर उनके पास ना बेहतर सुरक्षा है, ना आधुनिक सहूलियतें और ना ही वो इज्ज़त जो उन्हें मिलनी चाहिए। इसके बरअक्स बड़े फौजी अफसर अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाते हैं, आलीशान कॉलोनियों में रहते हैं और हर मुश्किल से महफूज़ रहते हैं।

यह तस्वीर पाकिस्तान के अंदर बढ़ती नाइंसाफी को साफ़ दिखाती है। एक तरफ़ आम जवान अपनी जान कुर्बान कर रहा है, दूसरी तरफ़ एलीट अफसर सिर्फ़ हुकूमत और ताकत का फायदा उठा रहे हैं। यही वजह है कि अब सुरक्षा बलों के अंदर भी मायूसी और गुस्सा बढ़ रहा है। जवान पूछ रहे हैं कि अगर उनकी मौत पर कोई खड़ा होने वाला नहीं, तो फिर वो किसके लिए लड़ रहे हैं?

बन्नू, लक्की मरवत और बाजौर के घरों में आज मातम है। माँएँ अपने बेटों को याद कर रही हैं, बच्चे अपने वालिद का इंतज़ार कर रहे हैं जो अब कभी वापस नहीं आएंगे। लेकिन इस दर्द के बीच सबसे बड़ा जख्म ये है कि जिनके लिए ये जवान जान दे रहे थे, वही सिस्टम उन्हें भूल चुका है।

KP के लोग अब खुल कर कह रहे हैं कि पाकिस्तान की फौज में बराबरी नहीं, बल्कि दोहरा निज़ाम चलता है। गरीब जवान सिर्फ़ लड़ने और मरने के लिए हैं, जबकि बड़े अफसर इख्तियार, दौलत और सहूलियतों का मज़ा लेते हैं। यही “फ्रंटलाइन सैक्रिफाइस बनाम एलीट प्रिविलेज” की असली तस्वीर है, जो आज पूरे पाकिस्तान के सामने बेनकाब हो रही है।

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