
सूत्रों के मुताबिक़, इमरान खान की सेहत लगातार बिगड़ रही है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें ज़रूरी मेडिकल इलाज देने से इंकार किया जा रहा है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि उनकी एक आंख की लगभग 85 फ़ीसद रोशनी जा चुकी है, मगर जेल इंतज़ामिया और हुकूमत की तरफ़ से मेडिकल सहूलियतें मुहैया नहीं कराई जा रहीं। इस मसले ने पाकिस्तान में इंसानी हुकूक़ की हालत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (PTI) ने इल्ज़ाम लगाया है कि आर्मी चीफ़ जनरल आसिम मुनीर की क़ियादत में फौज सियासी मुखालिफ़ीन को दबाने के लिए खुलकर कार्रवाई कर रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है और जो भी आवाज़ हुकूमत या फौज के खिलाफ उठती है, उसे ताक़त के ज़रिए खामोश करने की कोशिश होती है।
रावलपिंडी जेल के बाहर मौजूद चश्मदीदों ने बताया कि महिलाओं और बुज़ुर्ग समर्थकों को भी नहीं बख्शा गया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियोज़ में अफरा-तफरी, चीख-पुकार और लोगों को घसीटते हुए देखा गया, जिसने अवाम के अंदर ग़ुस्सा और बेचैनी बढ़ा दी है। कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने इसे “सिविलियन रिप्रेशन” यानी आम नागरिकों पर फौजी ज़ुल्म करार दिया।
माहिरीन का कहना है कि पाकिस्तान में फौज का सियासत में दखल कोई नई बात नहीं, लेकिन मौजूदा हालात पहले से ज़्यादा नाज़ुक नज़र आ रहे हैं। एक तरफ़ मुल्क आर्थिक बदहाली, महंगाई और बेरोज़गारी से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ सियासी अस्थिरता ने हालात को और बिगाड़ दिया है। ऐसे में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के खिलाफ सख़्त कार्रवाई पाकिस्तान की अंदरूनी हालत को और विस्फोटक बना सकती है।
इंसानी हुकूक़ से जुड़ी कई इंटरनेशनल तंजीमों और एक्टिविस्ट्स ने भी इस पूरे मामले पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि किसी भी कैदी को बुनियादी मेडिकल सहूलियत से महरूम रखना इंसानी हुकूक़ की खुली खिलाफ़वर्ज़ी है। साथ ही, शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नागरिकों पर बल प्रयोग लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ माना जा रहा है।
सोशल मीडिया पर भी #HumanRightsInPakistan और #ReleaseImranKhan जैसे हैशटैग तेज़ी से ट्रेंड कर रहे हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर एक पूर्व प्रधानमंत्री के साथ ऐसा सलूक हो सकता है, तो आम नागरिकों की हालत कैसी होगी। पाकिस्तान की अवाम के एक बड़े तबके में यह एहसास बढ़ रहा है कि मुल्क में सिविल हुकूमत से ज़्यादा ताक़त अब भी फौज के हाथों में है।
सियासी जानकारों का मानना है कि अगर पाकिस्तान में यही हालात जारी रहे, तो मुल्क को और ज़्यादा घरेलू अशांति, अवामी एहतिजाज और अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। इमरान खान की सेहत, उनके समर्थकों पर कार्रवाई और राजनीतिक दमन का मुद्दा अब सिर्फ़ पाकिस्तान का अंदरूनी मामला नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर मानवाधिकार और लोकतंत्र से जुड़ी बहस का हिस्सा बनता जा रहा है।

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