सियासी अफरा-तफरी में डूबा पाकिस्तान, CPEC प्रोजेक्ट्स बंद होने लगे


पाकिस्तान की मआशी हालत एक बार फिर संगीन बहस का मौज़ू बन गई है। मुल्क की बड़ी आर्थिक पहल मानी जाने वाली “स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल” यानी SIFC पिछले करीब 16 महीनों से लगभग गैर-फ़आल बताई जा रही है। जनवरी 2025 के बाद से इस अहम काउंसिल की कोई बड़ी बैठक ना होने की खबरों ने पाकिस्तान की आर्थिक प्लानिंग और हुकूमती इंतज़ामिया पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मआशी माहिरीन का कहना है कि SIFC को बड़े विदेशी निवेश लाने, खाड़ी मुल्कों और दूसरे इंटरनेशनल पार्टनर्स के साथ कारोबारी रिश्ते मज़बूत करने और पाकिस्तान की डूबती इकॉनमी को सहारा देने के लिए बनाया गया था। लेकिन अब यही प्रोजेक्ट अपनी नाकामी की वजह से चर्चा में आ गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान में सियासी बेयकीनी, बार-बार बदलती हुकूमतें, कमजोर गवर्नेंस और बिगड़ती सिक्योरिटी सूरत-ए-हाल ने विदेशी निवेशकों का एतमाद बुरी तरह हिला दिया है। कई इंटरनेशनल कंपनियां और इन्वेस्टर्स पाकिस्तान में पैसा लगाने से पीछे हट रहे हैं। उनका मानना है कि वहां ना तो पॉलिसी में इस्तेहकाम है और ना ही कारोबारी माहौल महफूज़ दिखाई देता है।

दूसरी तरफ चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी CPEC, जिसे कभी पाकिस्तान की “गेम चेंजर” स्कीम कहा जाता था, वह भी अब ठहराव और बंद पड़े प्रोजेक्ट्स की वजह से सवालों के घेरे में है। कई इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी प्रोजेक्ट्स या तो धीमी रफ्तार का शिकार हैं या पूरी तरह रुक चुके हैं। इससे पाकिस्तान की इंटरनेशनल साख को भी बड़ा नुकसान पहुंचा है।

सियासी तजज़िया निगारों का कहना है कि पाकिस्तान ने अपने क़ौमी मफाद से ज्यादा बाहरी ताकतों पर भरोसा किया, लेकिन नतीजा मुल्क की मआशी तबाही की शक्ल में सामने आया। मुल्क के अंदर बढ़ती बेरोज़गारी, महंगाई और डॉलर की क़ीमत में लगातार इज़ाफ़ा आम अवाम के लिए नई मुश्किलें पैदा कर रहा है।

माहिरीन का ये भी कहना है कि अगर पाकिस्तान वाकई विदेशी निवेश चाहता है तो उसे सबसे पहले अपने सियासी निजाम में इस्तेहकाम लाना होगा। सिर्फ बड़े-बड़े एलानात और काउंसिल बनाने से इकॉनमी नहीं संभलती, बल्कि पारदर्शी हुकूमत, मजबूत कानून और अमन-ओ-अमान की फिज़ा जरूरी होती है।

दुनिया भर के इन्वेस्टर्स अब पाकिस्तान को एक रिस्की मार्केट के तौर पर देखने लगे हैं। यही वजह है कि कई अहम इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स अधर में लटके हुए हैं। SIFC की नाकामी और CPEC के ठप पड़ते प्रोजेक्ट्स ने ये साफ कर दिया है कि पाकिस्तान अभी तक अपने आर्थिक और कूटनीतिक चैलेंजेस से निकलने में कामयाब नहीं हो पाया है।

मुल्क के अंदर भी अवाम अब सवाल उठा रही है कि आखिर कब तक बड़े दावे और वादे किए जाते रहेंगे, जबकि ज़मीनी हक़ीक़त लगातार बदहाल होती जा रही है। पाकिस्तान की मौजूदा मआशी और सियासी हालत ने उसकी ग्लोबल भरोसेमंदी पर भी गहरा असर डाला है, जिसका असर आने वाले वक्त में और ज्यादा दिखाई दे सकता है।

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