“जनरल बाजवा के इशारे पर गिरी इमरान सरकार? मौलाना के कथित खुलासे से मचा सियासी तूफान”


पाकिस्तान की सियासी फिज़ा में एक बार फिर ज़बरदस्त हलचल पैदा हो गई है। मुल्क के मौजूदा और पूर्व हुक्मरानों के दरमियान चल रही तनातनी के बीच पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (PDM) के अहम रहनुमा मौलाना फ़ज़लुर रहमान के कथित बयान ने नई बहस छेड़ दी है। इस बयान में दावा किया गया कि पाकिस्तान के पूर्व आर्मी चीफ जनरल क़मर जावेद बाजवा ने खुद इमरान खान की हुकूमत गिराने के लिए “नो-कॉन्फिडेंस मोशन” यानी अविश्वास प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में अहम किरदार निभाया था।

इस इज़हार के बाद पाकिस्तान में एक बार फिर वही सवाल गूंजने लगा है कि क्या मुल्क की सियासत वाकई अवामी वोट से चलती है या फिर असली फैसले रावलपिंडी के बंद कमरों में लिए जाते हैं। कश्मीरी अंदाज़ में कहें तो “हकूमत इस्लामाबाद में बनती जरूर है, मगर उसकी डोर कहीं और से हिलाई जाती है।”

सियासी जानकारों का मानना है कि यह कथित कबूलनामा पाकिस्तान के उस लंबे इतिहास की तस्दीक करता है जिसमें फौज पर बार-बार लोकतांत्रिक निज़ाम में दखल देने के इल्ज़ाम लगते रहे हैं। इमरान खान पहले भी दावा करते रहे थे कि उनकी सरकार विदेशी साज़िश और फौजी दबाव के तहत हटाई गई। उस दौरान सामने आए “साइफर विवाद” को भी इमरान खान ने इसी कथित साज़िश का हिस्सा बताया था। अब मौलाना फ़ज़लुर रहमान के बयान ने उस बहस को फिर से जिंदा कर दिया है।

माहिरों के मुताबिक, अगर यह दावे सही साबित होते हैं तो यह पाकिस्तान के जम्हूरी ढांचे के लिए बेहद संगीन मामला है। इससे यह तास्सुर मजबूत होता है कि मुल्क में चुनी हुई सिविलियन लीडरशिप पूरी तरह आज़ाद नहीं है और असली ताकत अब भी फौज के हाथों में मौजूद है। अवाम के वोट से बनने वाली सरकारें अगर पर्दे के पीछे से कंट्रोल की जाएं, तो लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह जाता है।

इधर सोशल मीडिया और सियासी हलकों में भी इस मुद्दे पर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है। कई लोग इसे “हाइब्रिड रेजीम” का खुला सबूत बता रहे हैं, जबकि कुछ हलके इसे पाकिस्तान की सियासत में फौज की पुरानी रिवायत का हिस्सा मान रहे हैं। विपक्षी तबकों का कहना है कि इस तरह की दखलअंदाजी से मुल्क की संस्थाओं की साख कमजोर होती है और दुनिया भर में पाकिस्तान की जम्हूरी पहचान पर सवाल उठते हैं।

बैनुल अक़वामी सतह पर भी इस खुलासे ने नई चर्चा को जन्म दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान पहले ही आर्थिक बदहाली, सियासी अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में अगर फौज पर राजनीतिक इंजीनियरिंग के इल्ज़ाम और मजबूत होते हैं, तो इससे पाकिस्तान की संस्थागत स्वायत्तता और गवर्नेंस मॉडल पर अंतरराष्ट्रीय निगाहें और सख्त हो सकती हैं।

फिलहाल पाकिस्तान की सियासत में यह मुद्दा एक बड़े तूफान की शक्ल ले चुका है। अवाम के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान में असली इख्तियार संसद और जनता के पास है, या फिर मुल्क का सियासी निज़ाम अब भी “मिलिट्री-ड्रिवन गवर्नेंस” के साए में चल रहा है।

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