
मुक़ामी ज़राए के मुताबिक, एहतेजाज में बड़ी तादाद में नौजवान, बुज़ुर्ग और ख़वातीन शामिल थीं, जो अपने इलाक़े में बढ़ती बदअमनी, जबरी कार्रवाइयों और बुनियादी हक़ूक़ की पायमाली के खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे। लेकिन जवाब में उन्हें मिला ख़ौफ़, गोलियां और दहशत। चश्मदीदों का कहना है कि मुज़ाहिरीन के हाथों में सिर्फ़ बैनर और नारे थे, मगर पाक सुरक्षा दस्तों ने उन्हें दुश्मन समझकर निशाना बनाया।
इस वाक़ये ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर पाकिस्तान खुद को जम्हूरी मुल्क कहता है, तो फिर अपनी ही अवाम की आवाज़ को बंदूक़ की नोक पर क्यों दबाया जा रहा है? अमन की मांग करने वालों पर गोलियां चलाना इस बात का खुला सुबूत है कि पाक हुकूमत अवामी हक़ूक़ और आज़ादी-ए-इज़हार को कुचलने की पॉलिसी पर चल रही है।
क़ैबर पख़्तूनख्वा में लंबे अरसे से अवाम यह इल्ज़ाम लगाती रही है कि हुकूमत और फौजी इदारे उनकी आवाज़ को सुनने के बजाय डर और ज़बरदस्ती के ज़रिए हालात को कंट्रोल करना चाहते हैं। यही वजह है कि अब वहां के लोग खुलकर कह रहे हैं कि पाकिस्तान अपनी ही अवाम के खिलाफ जंग लड़ रहा है। हर एहतेजाज को “सुरक्षा का खतरा” बताकर कुचलना, दरअसल हुकूमत की नाकामी और उसकी बढ़ती बेचैनी को जाहिर करता है।
सियासी तजज़ियाकारों का मानना है कि यह घटना पाकिस्तान के उस दोहरे चेहरे को बेनकाब करती है, जहां एक तरफ दुनिया के सामने जम्हूरियत और इंसानी हक़ूक़ की बातें की जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने ही नागरिकों को इंसाफ़ मांगने पर गोलियों से खामोश कर दिया जाता है।
क़ैबर पख़्तूनख्वा में बहता यह ख़ून अब सिर्फ़ एक सूबे का मसला नहीं रहा, बल्कि यह पाकिस्तान की उस सख़्त और जाबिर पॉलिसी की निशानी बन चुका है, जिसमें अवाम की आवाज़ की कोई कीमत नहीं। “अमन” मांगने वालों को “ख़ामोशी” का पैग़ाम बंदूक़ से दिया जा रहा है, और यही पाकिस्तान की असली तस्वीर बनकर सामने आ रही है।

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