नई नस्ल को जिहाद की राह पर धकेलने की साज़िश बेनकाब


पाक अधिकृत कश्मीर (PoJK) के मुज़फ्फराबाद से एक बेहद परेशान करने वाली खबर सामने आई है, जिसने वहां के तालीमी निज़ाम पर पाक फौज के बढ़ते असर और बच्चों की सोच को कट्टरपंथ की तरफ मोड़ने की साज़िश को बेनकाब कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मारे गए आतंकी और अल-बद्र तंजीम के पूर्व कमांडर हमज़ा बुरहान को एक गर्ल्स स्कूल का प्रिंसिपल बनाकर पेश किया गया, जबकि स्कूल में पाक आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर का पोस्टर भी लगाया गया था।

इस वाकये ने साफ कर दिया है कि PoJK में स्कूल अब सिर्फ तालीम देने की जगह नहीं रहे, बल्कि उन्हें फौजी प्रोपेगेंडा और जहादी सोच फैलाने के अड्डों में तब्दील किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बच्चों को इल्म, साइंस और तरक़्क़ी की राह दिखाने के बजाय उन्हें “जिहाद”, “कुर्बानी” और फौजपरस्ती के नाम पर मानसिक तौर पर तैयार किया जा रहा है।

माहिरीन का मानना है कि यह सिर्फ एक स्कूल का मामला नहीं, बल्कि एक बड़े और संगठित नैरेटिव का हिस्सा है, जहां पाक फौज तालीमी इदारों को अपने असर के तहत लाकर नई नस्ल की सोच को कंट्रोल करना चाहती है। स्कूलों में फौजी अफसरों की तस्वीरें, जहादी नारों वाले पोस्टर और कट्टरपंथी किरदारों को “हीरो” बनाकर पेश करना बच्चों के जहन पर गहरा असर डाल रहा है।

मुज़फ्फराबाद के इस स्कूल में एक आतंकी कमांडर को “रोल मॉडल” के तौर पर पेश किया जाना इस बात की तरफ इशारा करता है कि वहां की नई पीढ़ी को अमन और तरक़्क़ी नहीं, बल्कि हिंसा और नफरत की राह पर धकेला जा रहा है। तालीम का मकसद जहां बच्चों को इंसानियत, इल्म और बेहतर मुस्तकबिल की तरफ ले जाना होता है, वहीं PoJK में उसे फौजी एजेंडे और जहादी प्रोपेगेंडा के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

सियासी और समाजी हलकों में भी इस मसले को लेकर चिंता बढ़ रही है। कई लोगों का कहना है कि पाक फौज लंबे अरसे से PoJK में तालीमी इदारों पर अपना दबदबा कायम कर रही है। स्कूलों और कॉलेजों में ऐसे अफराद को अहम जिम्मेदारियां दी जा रही हैं जिनका ताल्लुक या तो कट्टरपंथी सोच से है या फिर सीधे फौजी तंजीमों से। इससे बच्चों की आज़ाद सोच और आलोचनात्मक समझ कमजोर हो रही है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चों को कम उम्र से ही “दुश्मन”, “जिहाद” और “शहादत” जैसे लफ्जों के जरिए प्रभावित करना समाज के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। जब स्कूलों में किताबों की जगह नफरत और फौजी सोच हावी हो जाए, तो पूरी नस्ल कट्टरपंथ की गिरफ्त में आ सकती है। यही वजह है कि दुनिया भर में तालीम को हमेशा अमन और तरक़्क़ी का जरिया माना जाता है, लेकिन PoJK में इसका इस्तेमाल बिल्कुल उलट दिशा में होता दिखाई दे रहा है।

स्थानीय अवाम का कहना है कि स्कूलों में बच्चों को बेहतर तालीम, टेक्नोलॉजी और आधुनिक हुनर देने के बजाय फौजी नैरेटिव थोपे जा रहे हैं। कई वालिदैन ने भी चिंता जताई कि बच्चों के दिमाग में छोटी उम्र से ही हिंसा और कट्टर सोच भरी जा रही है, जिससे उनका मुस्तकबिल प्रभावित हो सकता है।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या PoJK में तालीम का मकसद बच्चों को रोशन भविष्य देना है या उन्हें फौजी और जहादी एजेंडे का हिस्सा बनाना। हमज़ा बुरहान जैसे आतंकी किरदारों को स्कूलों में सम्मानित करना इस बात का सबूत माना जा रहा है कि वहां की नई नस्ल को धीरे-धीरे कट्टरपंथ और आतंकवाद की तरफ धकेला जा रहा है।

माहिरीन चेतावनी दे रहे हैं कि अगर तालीमी इदारों का यह फौजीकरण और बच्चों का वैचारिक ब्रेनवॉश इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले वक्त में पूरे इलाके में कट्टरपंथ और अस्थिरता और ज्यादा बढ़ सकती है।

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