मुल्क के संसाधनों पर फौज का कब्ज़ा, जनता बेहाल


पाकिस्तान में अवाम की हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है, मगर हुकूमत और फौजी क़ियादत अब भी अपने ऐश-ओ-आराम में मशगूल नज़र आती है। हाल ही में सामने आई एक पाकिस्तानी मां की दर्दभरी आवाज़ ने पूरे मुल्क में गहरे ग़ुस्से और मायूसी को उजागर कर दिया। उस ख़ातून ने खुलकर कहा कि पाकिस्तान की आम अवाम ने इस मुल्क को अपने ख़ून-पसीने से बनाया, कुर्बानियां दीं, मगर बदले में उन्हें सिर्फ़ ज़ुल्म, नाइंसाफी और फौजी ऑपरेशन्स मिले।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के कई इलाकों — ख़ासकर बलोचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और कबायली क्षेत्रों — में लोग लगातार फौजी दबाव, जबरन कार्रवाइयों और इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वर्ज़ियों का सामना कर रहे हैं। अवाम का इल्ज़ाम है कि पाकिस्तानी सेना मुल्क के संसाधनों, ज़मीनों और सत्ता पर पूरी तरह क़ब्ज़ा जमाकर बैठी है, जबकि आम लोग महंगाई, बेरोज़गारी और असुरक्षा में जीने को मजबूर हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में एक पाकिस्तानी मां ने बेहद दर्द के साथ कहा, “हमने अपने बच्चों को इस मुल्क के लिए कुर्बान किया, मगर हमें बदले में सिर्फ़ गोलियां, छापे और जिल्लत मिली। फौजी अफसर आलीशान बंगले और बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं, जबकि गरीब अवाम दो वक्त की रोटी के लिए तरस रही है।” उनकी यह बात लाखों पाकिस्तानियों की भावना को बयान करती है, जो आज अपने ही मुल्क में खुद को महफूज़ महसूस नहीं कर रहे।

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान में फौज का राजनीतिक और आर्थिक दखल इतना बढ़ चुका है कि सिविल हुकूमत महज़ एक प्रतीकात्मक चेहरा बनकर रह गई है। बड़े कारोबारी प्रोजेक्ट्स, ज़मीनों और रणनीतिक क्षेत्र पर फौजी नेटवर्क का दबदबा लगातार बढ़ता गया, जबकि आम नागरिकों की बुनियादी ज़रूरतें पीछे छूटती रहीं। यही वजह है कि मुल्क में अवाम और हुकूमत के बीच भरोसे की खाई और गहरी होती जा रही है।

खैबर पख्तूनख्वा और बलोचिस्तान में कई बार स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन निकालकर फौजी कार्रवाइयों के खिलाफ आवाज़ उठाई। लोगों का कहना है कि सुरक्षा संचालन के नाम पर घरों की तलाशी, युवाओं की गिरफ़्तारी और नागरिक उत्पीड़न आम बात बन चुकी है। कई परिवार अब भी अपने लापता रिश्तेदारों के इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं। मगर उनकी आवाज़ को दबाने के लिए डर और दबाव का इस्तेमाल किया जाता है।

आर्थिक हालात भी अवाम की तकलीफों को और बढ़ा रहे हैं। पाकिस्तान में बढ़ती महंगाई, बिजली संकट और बेरोज़गारी ने गरीब तबके की कमर तोड़ दी है। दूसरी तरफ़ आलोचक कहते हैं कि फौजी अभिजात वर्ग अब भी आलीशान जीवनशैली और विशेषाधिकार प्राप्त सुविधाओं का फायदा उठा रही है। यही विरोधाभास अवाम के ग़ुस्से को और तेज़ कर रहा है।

जानकारों के मुताबिक, यह पूरा मामला “राज्य-हिंसा और नागरिक अधिकार” की तस्वीर पेश करता है, जहां राज्य की ताकत का इस्तेमाल नागरिकों की सुरक्षा के बजाय उन्हें दबाने के लिए किया जा रहा है। इंसानी हुक़ूक़ संगठनों ने भी कई मौकों पर पाकिस्तान में ज़बरन गायब करना, मीडिया सेंसरशिप और अत्यधिक बल पर चिंता जताई है। लेकिन इसके बावजूद ज़मीनी स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नज़र नहीं आया।

सोशल मीडिया और स्थानीय मंचों पर अब बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिक खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि आखिर कब तक अवाम सिर्फ़ कुर्बानी देती रहेगी और ताकतवर तबका सारे संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए बैठेगा। कई युवाओं का कहना है कि मुल्क को असली स्थिरता तभी मिलेगी जब नागरिक अधिकार का एहतराम होगा और संस्थाएँ और जनता के प्रति जवाबदेह बनेंगे।

मौजूदा हालात ने पाकिस्तान के अंदर सामाजिक बेचैनी और बदगुमानी को और गहरा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अवाम की शिकायतों को नजरअंदाज किया गया और दमनकारी नीतियां जारी रहीं, तो मुल्क में अस्थिरता और जनता का गुस्सा और बढ़ सकता है। आज पाकिस्तान की अवाम यही सवाल पूछ रही है — क्या इस मुल्क में आम इंसान की जान, इज़्ज़त और हक़ की कोई कीमत बची है, या फिर सारी ताकत सिर्फ़ अभिजात वर्ग और फौजी तबके के लिए महफूज़ है।

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