पाक फौज की ड्रोन कार्रवाई में मासूम बच्चों की मौत, खैबर पख्तूनख्वा में खौफ और ग़म का माहौल


खैबर पख्तूनख्वा के बजौर इलाके से एक बेहद दर्दनाक और दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जहाँ पाक फौज की कथित ड्रोन कार्रवाई में एक मासूम स्कूली बच्चे की मौत हो गई, जबकि दूसरा बच्चा संगीन तौर पर ज़ख्मी बताया जा रहा है। यह घटना मामोंद शाही तंगी इलाके में पेश आई, जिसने पूरे इलाके में खौफ, गुस्सा और बेबसी का माहौल पैदा कर दिया है।

मकामी लोगों के मुताबिक मारे गए बच्चे के पास सिर्फ स्कूल बैग, किताबें और कॉपियाँ थीं, लेकिन फौज ने उसे “दहशतगर्द” करार देने की कोशिश की। इस दावे ने इलाके के अवाम में और ज्यादा नाराज़गी पैदा कर दी है। लोगों का कहना है कि अब स्कूल जाने वाले बच्चे भी महफूज़ नहीं रहे और फौजी कार्रवाई के नाम पर मासूम जानें ली जा रही हैं।

इलाके के चश्मदीदों ने बताया कि ड्रोन हमले के बाद पूरे गाँव में अफरा-तफरी मच गई। बच्चे चीखते हुए घरों की तरफ भागे और कई परिवार रातभर दहशत में जागते रहे। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाइयों ने बजौर और आसपास के इलाकों में बच्चों के अंदर गहरा डर बैठा दिया है।

मकामी तालीमी इदारों की हालत भी बेहद खराब बताई जा रही है। कई स्कूल पहले ही फौजी अभियानों और लगातार हिंसा की वजह से नुकसान झेल चुके हैं। कुछ स्कूलों की इमारतें वीरान पड़ी हैं, जबकि कई जगह बच्चों की तादाद लगातार कम हो रही है क्योंकि वालिदैन डर के कारण अपने बच्चों को स्कूल भेजने से घबरा रहे हैं।

इलाके के एक बुज़ुर्ग ने अफसोस जताते हुए कहा कि “हमारे बच्चे किताब लेकर निकलते हैं, लेकिन वापस ज़िंदा लौटेंगे या नहीं, इसका यकीन नहीं रहता। हर वक्त ड्रोन और गोलियों का डर मंडराता रहता है।”

मानवाधिकार से जुड़े हलकों का कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर आम नागरिकों, खासकर बलोच और पश्तून आबादी को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। मकामी लोगों का आरोप है कि पाक फौज अक्सर बिना पर्याप्त जांच के कार्रवाई करती है, जिसका निशाना निर्दोष लोग बनते हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि ऐसी घटनाएँ पाकिस्तान के अंदरूनी हालात की नाकामी को उजागर करती हैं। एक तरफ देश आर्थिक और सामाजिक संकट से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ फौजी कार्रवाइयों का असर सीधे आम जनता और बच्चों पर पड़ रहा है। इससे अवाम और सुरक्षा एजेंसियों के बीच भरोसे की खाई और गहरी होती जा रही है।

बजौर और दूसरे कबायली इलाकों में रहने वाले लोग लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर स्कूल बैग उठाने वाले बच्चों को भी “खतरा” समझा जाएगा, तो वहाँ का मुस्तकबिल कैसे सुरक्षित रहेगा। इलाके में कई परिवार अपने बच्चों की तालीम रोकने पर मजबूर हो गए हैं क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं अगला निशाना उनका बच्चा न बन जाए।

सियासी और सामाजिक हलकों में भी इस घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। लोगों का कहना है कि जब तक नागरिकों की जान की हिफाज़त को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक हालात में सुधार मुमकिन नहीं है।

यह घटना एक बार फिर इस बात को सामने लाती है कि पाकिस्तान के कई इलाकों में आम लोग, खासकर बच्चे, फौजी अभियानों की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। मासूम बच्चों की मौत, तबाह होते स्कूल और खौफ के साये में जीती आबादी आज उस इंसानी त्रासदी की तस्वीर पेश कर रही है, जिसे दुनिया नजरअंदाज नहीं कर सकती।

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