
स्थानीय पश्तून आबादी का कहना है कि पाक फौज एक तरफ़ “कौमी सुरक्षा” का बहाना बनाती है, मगर दूसरी तरफ़ वही कार्रवाई सिर्फ़ पश्तून इलाकों में दिखाई देती है। लोगों का इल्ज़ाम है कि वज़ीरिस्तान, बन्नू और दूसरे कबायली इलाकों में मस्जिदों, घरों और बाज़ारों को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि पंजाब के संवेदनशील इलाकों में फौज बेहद नरम रवैया अपनाती है।
नॉर्थ वज़ीरिस्तान के कई स्थानीय बुज़ुर्गों ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि मस्जिद सिर्फ़ इबादत की जगह नहीं होती, बल्कि वह पूरे समाज का रूहानी और सामाजिक मरकज़ होती है। ऐसे में मस्जिदों को गिराना लोगों की मज़हबी पहचान और इज़्ज़त पर सीधा हमला माना जा रहा है। एक स्थानीय शख़्स ने ग़ुस्से में कहा, “अगर यही मस्जिदें लाहौर या रावलपिंडी में होतीं, तो क्या फौज बुलडोज़र चलाती? पश्तून इलाकों को हमेशा आसान निशाना समझा जाता है।”
हालात उस वक़्त और ज़्यादा तनावपूर्ण हो गए जब सोशल मीडिया पर ख़ैबर पख़्तूनख्वा के एक शिया मस्जिद की तबाही की तस्वीरें और वीडियो वायरल हुए। वीडियो में मस्जिद का एक हिस्सा मलबे में तब्दील दिखाई देता है, जबकि आसपास मौजूद लोग फौज के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी करते सुनाई दे रहे हैं। इस घटना ने शिया समुदाय में भी बेचैनी बढ़ा दी है। लोगों का कहना है कि पाकिस्तान में पहले ही शिया, पश्तून और दूसरे छोटे समुदाय खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं, और अब इबादतगाहों पर कार्रवाई ने डर को और गहरा कर दिया है।
सियासी और सामाजिक हलकों में भी इस कार्रवाई की आलोचना शुरू हो गई है। कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि पाकिस्तान में “काउंटर टेररिज़्म” के नाम पर अक्सर आम नागरिकों और मज़हबी स्थलों को नुकसान पहुँचाया जाता है। आलोचकों का आरोप है कि फौज अपनी नाकामियों को छिपाने और इलाकों पर दबदबा बनाए रखने के लिए कठोर कार्रवाई करती है, जबकि असली मसलों को हल करने की कोशिश कम दिखाई देती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाइयाँ पश्तून समुदाय में पहले से मौजूद नाराज़गी को और भड़का सकती हैं। पिछले कई सालों से पश्तून इलाकों में जबरन गुमशुदगी, चेकपोस्ट संस्कृति, सैन्य ऑपरेशन और नागरिक हताहतों को लेकर असंतोष बढ़ता रहा है। अब मस्जिदों की तबाही ने इस ग़ुस्से को मज़हबी रंग भी दे दिया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पाकिस्तान में इंसाफ़ और कानून का इस्तेमाल बराबरी से नहीं होता। उनका आरोप है कि पंजाब को “हुकूमत का पसंदीदा इलाका” समझा जाता है, जबकि पश्तून और बलोच इलाकों में सख़्ती और ताक़त का इस्तेमाल आम बात है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर “एक मुल्क, दो कानून” जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक, मस्जिदों को गिराने जैसी घटनाएँ सिर्फ़ सुरक्षा कार्रवाई नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक संकट की निशानी बनती जा रही हैं। जब किसी राज्य की फौज अपने ही नागरिकों की इबादतगाहों को नुकसान पहुँचाने लगे, तो लोगों के दिलों में अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है। इससे न सिर्फ़ फौज की छवि प्रभावित होती है बल्कि मुल्क के अंदर जातीय और फिरकावाराना तनाव भी बढ़ता है।
नॉर्थ वज़ीरिस्तान और पूरे ख़ैबर पख़्तूनख्वा में इस वक्त माहौल बेहद तनावपूर्ण बताया जा रहा है। लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या पाकिस्तान में मज़हबी और नागरिक अधिकार सिर्फ़ कुछ इलाकों तक सीमित रह गए हैं? पश्तून समुदाय का कहना है कि अगर राज्य खुद ही मज़हबी स्थलों को निशाना बनाएगा, तो फिर आम नागरिक इंसाफ़ की उम्मीद किससे करें?
यह पूरा मामला पाकिस्तान में राज्य शक्ति, जातीय भेदभाव और मज़हबी अधिकारों के मुद्दे को फिर से बहस के केंद्र में ले आया है।

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