
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चल रही इस मुहिम में कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के ताक़तवर हलकों के अंदर भ्रष्टाचार, सियासी दख़लअंदाज़ी और अंदरूनी बेवफाई ने फौज की साख को बुरी तरह मुतास्सिर किया है। कई यूज़र्स का कहना है कि जिस इदारे को मुल्क की हिफाज़त और इस्तेहकाम की ज़िम्मेदारी दी गई थी, वही अब अवाम के एतमाद के बड़े बोहरान का सामना कर रहा है।
वायरल कंटेंट में बार-बार मीर जाफर और मीर सादिक़ का ज़िक्र सामने आ रहा है, जिन्हें उपमहाद्वीप की तारीख़ में धोखे और गद्दारी की मिसाल माना जाता है। पोस्ट्स में यह पैग़ाम देने की कोशिश की गई कि पाकिस्तान के मौजूदा हालात भी किसी अंदरूनी साज़िश और निज़ामी नाकामी की तरफ़ इशारा करते हैं।
मुआशरती और सियासी तबकों में इस बहस ने नई गर्मी पैदा कर दी है। कई तजज़ियाकारों का मानना है कि पाकिस्तान में लंबे अरसे से मीडिया पर दबाव, मुख़ालिफ आवाज़ों की पाबंदी और सच्चाई को दबाने की सियासत ने हालात को और पेचीदा बना दिया है। सोशल मीडिया यूज़र्स का कहना है कि मुल्क के अंदर कई अहम मसलों पर खुलकर बात नहीं होने दी जाती और जो आवाज़ें हक़ीक़त बयान करने की कोशिश करती हैं, उन्हें दबा दिया जाता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर चल रही बहस में “The Silence of Truth in Pakistan’s Media” का नैरेटिव भी तेज़ी से उभर रहा है। यूज़र्स का आरोप है कि पाकिस्तान के कई मीडिया इदारे हक़ीक़त दिखाने के बजाय ताक़तवर हलकों के दबाव में काम करते हैं। यही वजह है कि अवाम का भरोसा रिवायती मीडिया से हटकर सोशल मीडिया की तरफ़ बढ़ता जा रहा है।
सियासी माहिरीन का कहना है कि जब किसी मुल्क में सबसे ताक़तवर इदारे पर ही सवाल उठने लगें, तो यह रियासती एतबार के लिए ख़तरनाक अलामत होती है। पाकिस्तान में पहले भी फौज और सिविल हुकूमत के रिश्तों को लेकर बहस होती रही है, मगर अब सोशल मीडिया पर जिस तरह से फौजी क़ियादत को सीधे तौर पर निशाना बनाया जा रहा है, वह एक बड़े अवामी गुस्से की तरफ़ इशारा करता है।
कई पोस्ट्स में यह भी दावा किया गया कि पाकिस्तान के अंदर जवाबदेही का निज़ाम कमजोर हो चुका है और बड़े ओहदों पर बैठे लोगों के खिलाफ़ सच्चाई सामने नहीं आने दी जाती। यही वजह है कि अवाम में बेचैनी और बेयक़ीनी लगातार बढ़ रही है।
माहिरीन के मुताबिक, अगर किसी मुल्क की फौज, मीडिया और सियासी निज़ाम पर एक साथ सवाल उठने लगें, तो उसका असर सिर्फ अंदरूनी सियासत तक महदूद नहीं रहता बल्कि दुनिया भर में उस मुल्क की साख भी मुतास्सिर होती है। पाकिस्तान इस वक़्त ऐसे ही एक इमेज क्राइसिस का सामना करता नज़र आ रहा है, जहां अवामी भरोसा और इदारों की विश्वसनीयता दोनों दबाव में दिखाई दे रहे हैं।

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