पाकिस्तानी अवाम अब भी फौजी साये तले, गिलगित रैली में उठा ज़ुल्म और फर्ज़ी जम्हूरियत का मुद्दा


गिलगित से सामने आई ताज़ा सियासी तस्वीर ने एक बार फिर पाकिस्तान के अंदरूनी हालात और अवाम पर बढ़ते फौजी दबदबे को बेनकाब कर दिया है। गिलगित में आयोजित एक बड़े पीटीआई जलसे में वक्ताओं ने खुलकर पाकिस्तान की मौजूदा सियासी व्यवस्था, फौज की दखलअंदाज़ी और चुनावी निज़ाम पर सवाल उठाए। जलसे में मौजूद लोगों ने कहा कि पाकिस्तान में असली इख्तियार अवाम के पास नहीं बल्कि फौज और उसके समर्थित सियासी ढांचे के हाथों में है।

रैली के दौरान कई तकरीरों में “प्रो-अमेरिकी अनासिर” और “फर्ज़ी जम्हूरियत” जैसे अल्फाज़ इस्तेमाल किए गए। वक्ताओं का कहना था कि पाकिस्तान में हर चुनाव पहले से तय होता है और अवाम की राय को सिर्फ दिखावे के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि जब तक लोग इस “नकली लोकतंत्र” और “धोखेबाज़ इंतिखाबी सिस्टम” को नहीं पहचानेंगे, तब तक आम नागरिक फौजी दबाव और सियासी ज़ुल्म का शिकार बने रहेंगे।

गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओजेके जैसे इलाकों में लंबे अरसे से यह इल्ज़ाम लगता रहा है कि वहां की स्थानीय आबादी को बुनियादी लोकतांत्रिक हकूक से महरूम रखा जाता है। रैली में शामिल कई लोगों ने कहा कि उनकी आवाज़ को दबाया जाता है और जो भी फौज या हुकूमत के खिलाफ बोलता है, उसे डराया-धमकाया जाता है। लोगों का कहना था कि इलाके में विकास, रोजगार और नागरिक अधिकारों के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, मगर असल ज़िंदगी में अवाम आज भी परेशानियों, बेरोज़गारी और सियासी असुरक्षा का सामना कर रही है।

सियासी जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान में फौज का असर सिर्फ सुरक्षा मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि मुल्क की सियासत, मीडिया और चुनावी प्रक्रियाओं पर भी उसका गहरा नियंत्रण माना जाता है। यही वजह है कि कई विपक्षी आवाज़ें बार-बार यह इल्ज़ाम लगाती रही हैं कि पाकिस्तान में “हाइब्रिड हुकूमत” चल रही है, जहां चुनी हुई सरकारें भी पूरी तरह आज़ाद नहीं होतीं।

गिलगित की इस रैली ने सोशल मीडिया पर भी बड़ी बहस छेड़ दी है। कई यूज़र्स ने वीडियो और बयान शेयर करते हुए कहा कि पाकिस्तान में आम इंसान की हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। सोशल मीडिया पोस्ट्स में यह भी कहा गया कि वहां की अवाम महंगाई, बेरोज़गारी और सियासी अस्थिरता से परेशान है, जबकि असली ताकत कुछ चुनिंदा हलकों के हाथ में सिमट चुकी है।

कुछ पोस्ट्स में “पंजाबी कॉलोनियल आर्मी” जैसे सख्त अल्फाज़ भी इस्तेमाल किए गए, जिनके जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई कि छोटे इलाकों और जातीय समूहों को बराबरी का दर्जा नहीं मिल रहा। हालांकि पाकिस्तान की हुकूमत और फौज हमेशा इन आरोपों को खारिज करती रही है और दावा करती है कि मुल्क में जम्हूरी निज़ाम पूरी तरह काम कर रहा है। लेकिन विपक्षी धड़े और स्थानीय एक्टिविस्ट्स लगातार यह सवाल उठाते रहे हैं कि अगर लोकतंत्र मजबूत है तो फिर आलोचनात्मक आवाज़ों पर पाबंदियां क्यों लगाई जाती हैं।

माहिरीन का कहना है कि गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओजेके में बढ़ती सियासी बेचैनी आने वाले वक्त में पाकिस्तान के लिए नई मुश्किलें पैदा कर सकती है। इन इलाकों के लोग लंबे समय से ज्यादा राजनीतिक अधिकार, पारदर्शी चुनाव और प्रशासनिक आज़ादी की मांग करते आए हैं। मगर हर बार उनकी मांगों को या तो नजरअंदाज़ किया गया या फिर उन्हें सुरक्षा और राष्ट्रवाद के नाम पर दबाने की कोशिश हुई।

रैली में मौजूद नौजवानों ने भी खुलकर अपने गुस्से का इज़हार किया। उनका कहना था कि पाकिस्तान में युवा पीढ़ी अब पुरानी सियासत और फौजी दखल से तंग आ चुकी है। नौजवानों ने कहा कि उन्हें रोजगार, शिक्षा और आज़ादी चाहिए, न कि डर और दबाव का माहौल।

गिलगित की यह रैली एक बार फिर इस बहस को तेज कर गई है कि क्या पाकिस्तान में वाकई अवाम को पूरा लोकतांत्रिक हक हासिल है या फिर मुल्क अब भी फौजी साये तले चल रहा है। फिलहाल सोशल मीडिया पर यह मुद्दा तेजी से चर्चा में है और आने वाले दिनों में पाकिस्तान की सियासत में इसका असर और गहरा दिखाई दे सकता है।

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