बयान अमन के, रिश्ते दहशत से : पाकिस्तान की सियासत का काला सच

 


दशकों से पाकिस्तान दुनिया को यह यक़ीन दिलाने की कोशिश करता आया है कि वह अपनी सरज़मीन पर मौजूद दहशतगर्दी के ढाँचों को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए संजीदा है। लेकिन हर कुछ साल बाद कोई कोई ऐसा वाक़िया सामने जाता है जो पुरानी शंकाओं को फिर ज़िंदा कर देता है और पूरी दुनिया को एक बार फिर उन असहज सवालों का सामना करने पर मजबूर कर देता है जिनसे पाकिस्तान लंबे समय से बचने की कोशिश करता रहा है। हाल ही में पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार का कथित तौर पर लश्कर--तैयबा के सरगना हाफ़िज़ सईद के बेटे तल्हा सईद के साथ सार्वजनिक तौर पर दिखाई देना भी ऐसा ही एक मामला बन गया। पहली नज़र में एक तस्वीर मामूली लग सकती है, लेकिन जियोपॉलिटिक्स में प्रतीकों की अपनी अहमियत होती है। जब किसी मुल्क के असरदार सियासी चेहरे उन लोगों के साथ नज़दीकी में नज़र आते हैं जिनका नाम वैश्विक स्तर पर कट्टरपंथी या दहशतगर्द नेटवर्क्स से जोड़ा जाता रहा हो, तो यह सवाल उठना लाज़िमी हो जाता है कि पाकिस्तान की सियासी और सुरक्षा व्यवस्था का उन नेटवर्क्स के साथ रिश्ता आख़िर कितना गहरा है, जिन्होंने दशकों से दक्षिण एशिया की सुरक्षा और स्थिरता को प्रभावित किया है।

मसला सिर्फ़ एक मुलाक़ात, एक तस्वीर या एक सियासी शख़्सियत तक सीमित नहीं है। असल चिंता उस लंबे इतिहास से निकलती है जिसमें पाकिस्तान बार-बार वैश्विक दहशतगर्दी, प्रॉक्सी वॉर और कट्टरपंथी ढाँचों पर होने वाली अंतरराष्ट्रीय बहसों के केंद्र में दिखाई देता रहा है। 1980 के दशक के अफ़ग़ान जिहाद से लेकर कश्मीर में सीमा पार दहशतगर्दी तक, तालिबान को कथित पनाह देने के आरोपों से लेकर एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के पकड़े जाने तक, पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था पर दशकों से यह इल्ज़ाम लगता रहा है कि उसने कुछ संगठनों को या तो नज़रअंदाज़ किया या फिर उन्हें अपने भू-राजनीतिक मक़सदों के लिए इस्तेमाल किया। सरकारें बदलीं, फौजी हुकूमतें आईं-गईं, दुनिया को कई तरह की सफ़ाइयाँ दी गईं, लेकिन इन आरोपों का साया पाकिस्तान की साख से कभी पूरी तरह हट नहीं पाया।

इस पूरे संकट की जड़ें शीत युद्ध के दौर तक जाती हैं, जब दहशतगर्द नेटवर्क्स को क्षेत्रीय प्रभाव के औज़ार के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा। सोवियत-अफ़ग़ान जंग के दौरान पाकिस्तान पश्चिमी देशों की मदद से चलाए जा रहे एंटी-सोवियत ऑपरेशनों का अहम केंद्र बन गया। उसी दौर में पूरे इलाके में ऐसे ढाँचे तैयार हुए जिन्हें अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल था। वक्त गुज़रने के साथ ये नेटवर्क्स सिर्फ़ हथियारबंद गुट नहीं रहे, बल्कि वैचारिक, धार्मिक और रणनीतिक ढाँचों में बदल गए जिनका असर दक्षिण एशिया से कहीं आगे तक फैल गया। सुरक्षा मामलों के जानकार लंबे समय से कहते आए हैं कि इसी दौर ने पाकिस्तान की “नॉन-स्टेट एक्टर्स” को लेकर सोच को आकार दिया, जहाँ प्रॉक्सी समूहों को सीधे युद्ध के बजाय रणनीतिक गहराई हासिल करने के औज़ार के रूप में देखा जाने लगा।

इसी व्यापक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों का नाम अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के केंद्र में आया। इन दोनों संगठनों पर भारत, ख़ासतौर पर जम्मू-कश्मीर में, कई बड़े आतंकी हमलों में शामिल होने के आरोप लगते रहे हैं। 2001 का भारतीय संसद हमला, 2008 के मुंबई हमले और सीमा पार घुसपैठ की कई घटनाओं ने पाकिस्तान-आधारित नेटवर्क्स पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी और दबाव को और बढ़ा दिया। मुंबई हमला तो पूरी दुनिया के लिए एक झटका था। 160 से ज़्यादा लोगों की जान लेने वाला वह हमला सिर्फ़ भारत-पाकिस्तान तनाव का हिस्सा नहीं माना गया, बल्कि एक वैश्विक आतंकवादी घटना के रूप में देखा गया जिसने यह दिखाया कि पाकिस्तान की धरती से संचालित नेटवर्क्स कितने संगठित, प्रशिक्षित और प्रभावशाली हो चुके थे। सालों बाद भी जवाबदेही की धीमी रफ़्तार और कट्टरपंथी चेहरों की बार-बार सार्वजनिक मौजूदगी पाकिस्तान की छवि को नुकसान पहुँचाती रही।

2011 में एबटाबाद के भीतर ओसामा बिन लादेन का मिलना दुनिया भर में पाकिस्तान को लेकर शंकाओं को और गहरा कर गया। दुनिया के सबसे वांछित आतंकवादी का पाकिस्तान के अंदर, वह भी एक बड़े सैन्य अकादमी के बेहद क़रीब, वर्षों तक छिपा रहना ऐसा मामला था जिसे आसानी से नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। चाहे राज्य के कुछ हिस्सों को इसकी जानकारी रही हो या नहीं, लेकिन इस घटना ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी में डाल दिया और उन आरोपों को और मज़बूत कर दिया कि कट्टरपंथी नेटवर्क्स को वर्षों तक किसी न किसी स्तर पर संस्थागत ढील, अनदेखी या संरक्षण मिलता रहा। एबटाबाद की घटना धीरे-धीरे एक बड़े वैश्विक डर का प्रतीक बन गई — यह डर कि कहीं आतंकवादी नेटवर्क्स पाकिस्तान की रणनीतिक और वैचारिक संरचना के भीतर इतने गहरे तो नहीं समा चुके कि उन्हें पूरी तरह अलग करना लगभग नामुमकिन हो जाए।

पाकिस्तान हमेशा से इन आरोपों से इनकार करता आया है और उसने बार-बार यह कहा है कि वह खुद भी आतंकवाद का शिकार रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि पाकिस्तान ने भी आतंकवादी हिंसा की बड़ी कीमत चुकाई है। हज़ारों पाकिस्तानी नागरिक, सैनिक और पुलिसकर्मी कट्टरपंथी संगठनों के हमलों में मारे गए। पेशावर, कराची और लाहौर जैसे शहरों ने वर्षों तक बम धमाकों और ख़ूनी हमलों का दर्द झेला। लेकिन दुनिया की असली चिंता सिर्फ़ यह नहीं रही कि पाकिस्तान में आतंकवाद मौजूद है। बड़ी चिंता हमेशा यह रही कि पाकिस्तान ने कथित तौर पर उन संगठनों के बीच फर्क किया जो उसके अपने राज्य के लिए खतरा थे और उन समूहों के बीच जिन्हें क्षेत्रीय रणनीति के लिहाज़ से “काम का” माना जाता रहा। “अच्छे” और “बुरे” आतंकवादियों की इसी कथित सोच ने इस्लामाबाद की साख को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाया।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ और निगरानी संस्थाएँ लगातार पाकिस्तान के भीतर आतंकवादी फंडिंग, वैचारिक कट्टरता और संगठनों के नाम बदलकर दोबारा सक्रिय होने पर चिंता जताती रही हैं। कई बार ऐसा हुआ कि जिन संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया, वे किसी नए नाम, चैरिटी नेटवर्क या धार्मिक मंच के ज़रिए फिर सामने आ गए। इससे यह धारणा बनी कि बाहरी दबाव में कुछ अस्थायी कार्रवाई तो की जाती है, लेकिन कट्टरपंथ के बड़े ढाँचे को पूरी तरह कभी नहीं तोड़ा जाता। FATF की ग्रे लिस्ट में पाकिस्तान का बार-बार आना भी इन्हीं चिंताओं को मज़बूत करता रहा। हालाँकि बाद में पाकिस्तान सुधारों के बाद ग्रे लिस्ट से बाहर निकल गया, लेकिन दुनिया के कई पर्यवेक्षकों को अब भी इस बात पर शक है कि ये बदलाव कितने गहरे और स्थायी हैं।

मसला सिर्फ़ औपचारिक संगठनों तक सीमित नहीं है। सबसे खतरनाक बात यह है कि लंबे समय तक कट्टरपंथ का माहौल धीरे-धीरे समाज और राजनीति के भीतर सामान्य बनता चला जाता है। जब ऐसे लोगों को सामाजिक स्वीकार्यता, सियासी पहुँच या सार्वजनिक मंच मिलता रहता है जिनका संबंध चरमपंथी नेटवर्क्स से जोड़ा जाता रहा हो, तो यह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर एक बेहद परेशान करने वाला संदेश देता है। इससे यह भ्रम पैदा होता है कि राज्य वास्तव में कहाँ खड़ा है। लाहौर का हालिया विवाद इसलिए अहम बन जाता है क्योंकि वह इसी धारणा को मज़बूत करता है कि कट्टरपंथी नेटवर्क्स पूरी तरह हाशिए पर नहीं गए, बल्कि अब भी प्रभाव और पहुँच के दायरों में मौजूद हैं।

इस अस्पष्टता की कीमत पूरे दक्षिण एशिया ने चुकाई है। यह क्षेत्र दशकों से तनाव, बगावत, सीमा पार दहशतगर्दी और सुरक्षा संकटों के चक्र में फँसा हुआ है। हर बड़े आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्ते टूटने की कगार पर पहुँच जाते हैं और दो परमाणु हथियारों से लैस मुल्क खतरनाक तनाव में घिर जाते हैं। अफ़ग़ानिस्तान ने भी वर्षों तक ऐसे संघर्ष देखे जिनमें प्रॉक्सी वॉर और आतंकवादी सुरक्षित ठिकानों के आरोपों की बड़ी भूमिका रही। स्थानीय संघर्षों से पैदा हुए कट्टरपंथी नेटवर्क्स धीरे-धीरे सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक जिहादी आंदोलनों का हिस्सा बन गए और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को भी गंभीर चुनौती दी।

साथ ही, दुनिया का रवैया भी कई बार विरोधाभासी दिखाई देता है। वैश्विक ताकतें सिद्धांतों में आतंकवाद की निंदा करती हैं, लेकिन भू-राजनीतिक हित अक्सर यह तय करते हैं कि किसी देश पर कितना दबाव डाला जाएगा। पाकिस्तान की सामरिक स्थिति, सैन्य अहमियत और क्षेत्रीय प्रभाव ने उसे कई बार पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय अलगाव से बचाए रखा। बड़ी शक्तियाँ अक्सर दीर्घकालिक जवाबदेही के बजाय अल्पकालिक रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देती रहीं, जिसकी वजह से दबाव और समझौतों का यह चक्र चलता रहा लेकिन आतंकवाद और कट्टरपंथ की जड़ों पर निर्णायक चोट नहीं हो सकी।

इतिहास बार-बार यह साबित करता है कि चरमपंथी नेटवर्क्स को हमेशा नियंत्रित नहीं रखा जा सकता। जिन संगठनों को कभी रणनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, वे धीरे-धीरे उन्हीं राज्यों के लिए खतरा बन जाते हैं जिन्होंने कभी उन्हें बर्दाश्त किया था। पाकिस्तान खुद भी इसी आग का शिकार हुआ है। सांप्रदायिक हिंसा, आत्मघाती हमले और आम नागरिकों पर हमलों ने यह दिखा दिया कि कट्टरपंथ को लंबे समय तक जीवित रहने देना आख़िरकार पूरे समाज को अस्थिर कर देता है।

आज पाकिस्तान वैश्विक मंच पर बढ़ती हुई साख की चुनौती का सामना कर रहा है। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय निगरानी ने उसकी कूटनीतिक स्थिति को कमज़ोर किया है। ऐसे माहौल में छोटी दिखने वाली प्रतीकात्मक घटनाएँ भी बड़ी बन जाती हैं क्योंकि वे पहले से मौजूद अंतरराष्ट्रीय चिंताओं को और मज़बूत कर देती हैं। हर बार जब सियासी चेहरे ऐसे लोगों के साथ दिखाई देते हैं जिनका नाम वैश्विक स्तर पर प्रतिबंधित नेटवर्क्स से जुड़ता रहा है, तब पाकिस्तान की यह कोशिश और मुश्किल हो जाती है कि वह खुद को दुनिया के सामने एक ज़िम्मेदार “काउंटर-टेरर” साझेदार साबित कर सके।

असल सबक सिर्फ़ पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। आधुनिक दुनिया अब आतंकवादी संगठनों को अस्थायी रणनीतिक औज़ार या नियंत्रित किए जा सकने वाले राजनीतिक संसाधन की तरह देखने की गलती नहीं दोहरा सकती। इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि जब कट्टरपंथ को संस्थागत और सामाजिक जगह मिल जाती है, तो वह पूरे क्षेत्रों को अस्थिर कर देता है और अंततः उन्हीं देशों के लिए खतरा बन जाता है जिन्होंने कभी उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। दक्षिण एशिया पहले ही प्रॉक्सी वॉर, आतंकवाद और रणनीतिक अस्पष्टता की बहुत बड़ी कीमत चुका चुका है। इस क्षेत्र का भविष्य अब और ज़्यादा समय तक उन नेटवर्क्स के रहमोकरम पर नहीं छोड़ा जा सकता जो आधिकारिक कूटनीति की सतह के नीचे सक्रिय रहते हैं।

लाहौर का हालिया विवाद शायद कुछ समय बाद अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों से गायब हो जाए, लेकिन उसने जो सवाल उठाए हैं वे बने रहेंगे। आख़िर क्यों कट्टरपंथ से जुड़े चेहरे बार-बार सामाजिक और सियासी वैधता के दायरों में दिखाई देते हैं? दशकों की वैश्विक निगरानी के बावजूद ऐसी घटनाएँ दोहराई क्यों जाती हैं? और पाकिस्तान दुनिया की नज़रों में आतंकवाद की छाया से खुद को पूरी तरह अलग करने में अब तक सफल क्यों नहीं हो पाया?

जब तक इन विरोधाभासों का पूरी पारदर्शिता और स्थायी संरचनात्मक कार्रवाई के साथ समाधान नहीं किया जाता, तब तक पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर संदेह, आलोचना और अविश्वास का सामना करना पड़ता रहेगा। आतंकवाद का विरोध चुनिंदा तरीके से नहीं किया जा सकता, न उसे रणनीतिक रूप से इस्तेमाल करके हमेशा छिपाया जा सकता है। दुनिया इस सोच के नतीजे बहुत लंबे समय से देखती आ रही है।


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