मई 2026 में जब प्रिंस रहीम आगा ख़ान पंचम का पाकिस्तान का छह रोज़ा सरकारी दौरा शुरू हुआ, तो पाकिस्तानी हुकूमत फ़ौरन एक बड़े सियासी तमाशे की शक्ल में नज़र आने लगी। आला फौजी अफसरों ने शाही इस्तकबाल किया, सियासी क़ियादत ने बड़े-बड़े प्रोग्राम सजाए और सरकारी मीडिया ने मुल्क भर में ऐसी तस्वीर पेश करनी शुरू की जिसमें पाकिस्तान को एक “बरदाश्त करने वाला”, “मज़हबी हमआहंगी रखने वाला” और “अक़ल्लियतों का एहतराम करने वाला” मुल्क दिखाया गया। इस दौरे को ऐसे पेश किया गया जैसे पाकिस्तान एक मुतवाज़िन इस्लामी रियासत है जो हर फ़िरके और बिरादरी को बराबरी से गले लगाती है। बरसों से इंतिहापसंदी, फ़िरकावाराना नफ़रत और कट्टरपंथ के इल्ज़ाम झेल रहे पाकिस्तान के लिए यह दौरा अपनी अंतरराष्ट्रीय साख चमकाने का एक सुनहरा मौक़ा बन गया।
लेकिन इन चमकदार तस्वीरों, कैमरों और सियासी ड्रामेबाज़ी के पीछे एक बहुत ही ख़ौफ़नाक हक़ीक़त छुपी हुई है, जिसे कोई भी शाही इस्तकबाल छुपा नहीं सकता। जिस वक़्त पाकिस्तानी निज़ाम एक मशहूर शिया रहनुमा के लिए रेड कार्पेट बिछा रहा था, उसी वक़्त मुल्क के आम शिया मुसलमान ख़ौफ़, तशद्दुद और नाइंसाफ़ी के साये में ज़िंदगी गुज़ार रहे थे। पराचिनार और कुर्रम के ख़ूनी इलाक़ों से लेकर क्वेटा के बंद और घिरे हुए हज़ारा मोहल्लों तक, शिया बिरादरी आज भी टारगेट किलिंग, धमाकों और नफ़रत भरी मुहिमों का सामना कर रही है। यह तज़ाद इतना साफ़ है कि उसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है। दुनिया को दिखाने के लिए पाकिस्तान चुनिंदा शिया चेहरों की इज़्ज़त करता है, मगर अपने ही मुल्क के लाखों शियाओं को अमन, बराबरी और तहफ़्फ़ुज़ देने में नाकाम दिखाई देता है।
असल में यह तज़ाद पाकिस्तानी रियासत के अंदरूनी बुहरान को बेनक़ाब करता है। इस्लामाबाद ने बरसों में दुनिया के सामने एक “सॉफ्ट इमेज” बनाना सीख लिया है, जबकि अंदरूनी इस्लाहात से बचता रहा है। बड़े दौरे, कंट्रोल किया गया मीडिया नैरेटिव और शाही सियासी रस्में बार-बार इस्तेमाल की जाती हैं ताकि दुनिया को लगे कि पाकिस्तान एक बर्दाश्त वाला मुस्लिम मुल्क है। प्रिंस रहीम आगा ख़ान पंचम का इस्तकबाल भी इसी रणनीति का हिस्सा मालूम होता है। “आगा ख़ान” नाम दुनिया भर में इज़्ज़त रखता है, ख़ासकर इस्माइली नेटवर्क्स और पश्चिमी सियासी हलकों में। पाकिस्तान इस नाम के साथ खुद को जोड़कर यह पैग़ाम देना चाहता है कि वह एक मुतवाज़िन और सबको साथ लेकर चलने वाली रियासत है। मगर जब आम शिया नागरिक रोज़ाना ख़ौफ़ और महरूमी का सामना करें, तब ऐसे इशारे सिर्फ़ खोखले नज़र आते हैं।
पाकिस्तान में शियाओं के खिलाफ़ फ़िरकावाराना हिंसा कोई अफ़वाह या बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई बात नहीं है, बल्कि यह बरसों के ख़ूनी रिकॉर्ड में दर्ज हक़ीक़त है। साउथ एशिया टेररिज़्म पोर्टल के मुताबिक़, 2022 से शुरुआती 2026 तक शियाओं को निशाना बनाने वाले हमलों में 180 से ज़्यादा लोग मारे गए और लगभग 400 ज़ख़्मी हुए। अगर पुराने आंकड़े देखें तो तस्वीर और भी डरावनी बन जाती है। 2013 से 2018 के बीच पाकिस्तान में 2000 से ज़्यादा लोग फ़िरकावाराना हिंसा में मारे गए और 3200 से ज़्यादा घायल हुए, जिनमें बड़ी तादाद शिया और हज़ारा बिरादरी की थी। यह आंकड़े साबित करते हैं कि यह कोई अलग-अलग हादसे नहीं, बल्कि एक लगातार चलने वाला सिलसिला है। मुहर्रम के जुलूसों पर बार-बार आत्मघाती हमले हुए, मस्जिदों, मजलिसों और आम लोगों के काफ़िलों को निशाना बनाया गया। आज हालात यह हैं कि कई शिया घराने हर मज़हबी मौके पर यह डर लेकर जीते हैं कि कहीं अगला धमाका उन्हीं के बीच न हो जाए।
इस दर्दनाक सूरत-ए-हाल की सबसे बड़ी मिसाल पराचिनार और कुर्रम का इलाक़ा है, जो पाकिस्तान की नाकामी की पहचान बन चुका है। बरसों से यहाँ फ़िरकावाराना हिंसा लगातार जारी है। शिया बहुल इलाक़ों को जोड़ने वाली सड़कों पर घात लगाकर हमले होते रहे हैं। सिक्योरिटी एस्कॉर्ट के बावजूद मुसाफ़िरों के काफ़िलों पर हमले किए गए। बाज़ार और सार्वजनिक जगहें धमाकों और गोलीबारी का निशाना बनती रही हैं। इन इलाक़ों के लोगों के लिए जनाज़े, दहशत और इमरजेंसी दफ़्न अब रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। पाकिस्तानी हुकूमत बार-बार अमन बहाल करने और दहशतगर्द गिरोहों को खत्म करने के दावे करती रही, मगर हिंसा का चक्र हर बार फिर लौट आता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान के पास फ़िरकावाराना आतंकवाद खत्म करने की ताक़त नहीं, या फिर कुछ गहरे सियासी और वैचारिक मसले रास्ता रोक रहे हैं।
क्वेटा की हज़ारा शिया बिरादरी शायद पाकिस्तान की फ़िरकावाराना हक़ीक़त का सबसे दर्दनाक चेहरा है। अपनी नस्ली शक्ल-सूरत की वजह से आसानी से पहचाने जाने वाले हज़ाराओं ने बरसों से टारगेट किलिंग, आत्मघाती धमाकों और सामाजिक अलगाव का सामना किया है। उनके मोहल्ले अब क़िलेबंद बस्तियों में बदल चुके हैं, जहाँ हर तरफ़ चेकपोस्ट और हथियारबंद पहरा है। जो सिक्योरिटी इंतज़ाम कुछ वक़्त के लिए होने चाहिए थे, वही अब स्थायी डर की दीवार बन चुके हैं। बहुत से हज़ारा नौजवान यूनिवर्सिटी, नौकरी या पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करने से डरते हैं क्योंकि सुरक्षित इलाक़े से बाहर निकलना मौत को दावत देने जैसा हो सकता है। उनकी तिजारती और रोज़गार की संभावनाएँ भी बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। कई विश्लेषकों और इंसानी हक़ूक़ के कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान में हज़ाराओं की हालत को “धीमी रफ़्तार वाली नस्ली और फ़िरकावाराना सफ़ाई” तक क़रार दिया है, और हालात देखकर इस राय को झुठलाना मुश्किल लगता है।
सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि इतने सालों के ख़ून-ख़राबे के बावजूद इंतिहापसंद ढांचा अब भी ज़िंदा है। हर बड़े हमले के बाद पाकिस्तानी हुकूमत मज़म्मत करती है, अफसर बयान जारी करते हैं, कुछ दिनों के लिए सिक्योरिटी बढ़ा दी जाती है और जांच के वादे किए जाते हैं। मगर वह पूरा तंत्र, जो फ़िरकावाराना नफ़रत को ज़िंदा रखता है, लगातार बचा रहता है। कई कट्टरपंथी तंजीमें अंतरराष्ट्रीय दबाव में बैन होती हैं, फिर नए नामों से सामने आ जाती हैं। कट्टर मौलवी खुलेआम शियाओं को “काफ़िर” और “गुमराह” कहते हैं, लेकिन उनके खिलाफ़ कोई सख़्त कार्रवाई नज़र नहीं आती। सोशल मीडिया पर भी शिया विरोधी नफ़रत तेज़ी से फैलती है, जो नई नस्लों के बीच असहिष्णुता को आम बना रही है। अब यह ज़हर सिर्फ़ चरमपंथी हलकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे मुख्यधारा के बहस-मुबाहिसों में भी दाख़िल हो चुका है।
हाल के वर्षों में इदारा-स्तरीय भेदभाव को लेकर भी फ़िक्र बढ़ी है। तालीमी निसाब और कुछ मज़हबी कानूनों को लेकर बहसों में कई बार ऐसे सख़्त फ़िरकावाराना नज़रिए सामने आए हैं जिनसे शिया बिरादरी को यह डर सताने लगा है कि कहीं बहिष्कारी सोच खुद रियासती ढांचे का हिस्सा न बनती जा रही हो। आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान का मसला सिर्फ़ आतंकवाद या सिक्योरिटी फेल्योर नहीं, बल्कि वैचारिक दिशा का भी संकट है। कोई भी रियासत खुद को गैर-जानिबदार नहीं कह सकती जब वह उन सोचों को सहन करे जो पूरे के पूरे फ़िरकों को ग़ैर-मशरूअ ठहराती हों। और न ही वह दुनिया को खुद को “प्लूरलिस्टिक रिपब्लिक” के तौर पर बेच सकती है जबकि अंदरूनी समाज में नफ़रत भरी बयानबाज़ी लगातार असर डाल रही हो।
इसीलिए प्रिंस रहीम आगा ख़ान पंचम का शाही इस्तकबाल सिर्फ़ एक सियासी इवेंट नहीं रह जाता, बल्कि पाकिस्तान के बड़े तज़ाद की निशानी बन जाता है। इस्लामाबाद दुनिया से वैधता, विदेशी निवेश और रणनीतिक साझेदारियाँ चाहता है। वह चाहता है कि दुनिया उसे एक तरक़्क़ीपसंद इस्लामी रियासत के तौर पर देखे। मगर पराचिनार, क्वेटा और दूसरे इलाक़ों की हक़ीक़त हर उस चमकदार तस्वीर को कमज़ोर कर देती है जिसमें “बरदाश्त” और “हमआहंगी” दिखाने की कोशिश की जाती है। सिर्फ़ रस्मी इज़्ज़त या शाही मेहमाननवाज़ी आम शिया नागरिकों के दर्द और डर को मिटा नहीं सकती।
आख़िर में किसी भी रियासत की असली पहचान उसके शाही कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि उसके सबसे कमज़ोर नागरिकों की हालत से होती है। पाकिस्तान शायद कुछ समय के लिए शाही इस्तकबालों और बड़ी तस्वीरों के ज़रिए दुनिया की सुर्खियाँ हासिल कर ले, मगर जब आम शिया परिवार आज भी अपने मारे गए लोगों को दफ़्न कर रहे हों और बैरिकेड्स के पीछे ज़िंदगी गुज़ार रहे हों, तब यह चमकदार तस्वीरें टिक नहीं पातीं। दुनिया भी अब इस तज़ाद को समझने लगी है। कोई मुल्क हमेशा के लिए बाहर सहिष्णुता का दावा और अंदर फ़िरकावाराना डर दोनों साथ नहीं चला सकता।
जब तक पाकिस्तान इंतिहापसंद ढांचे को खत्म करने, नफ़रत फैलाने वाली बयानबाज़ी पर सख़्त कार्रवाई करने और हर फ़िरके को बराबर सुरक्षा देने की सच्ची सियासी इच्छाशक्ति नहीं दिखाता, तब तक उसकी हर “समावेशी” तस्वीर सिर्फ़ एक दिखावा ही मानी जाएगी। और तब तक, दुनिया के लिए सजाया गया हर शाही इस्तकबाल पाकिस्तान के भूले-बिसरे शिया समुदायों के जनाज़ों, डर और ख़ामोश तकलीफ़ के साये में दबा रहेगा।

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