
पाकिस्तान के एक सियासी कमेंटेटर ने दावा किया है कि 22 मई 2026 को तेहरान पहुँचे जनरल असीम मुनीर को ईरानी हलकों में वो भरोसा हासिल नहीं हुआ जिसकी उम्मीद पाकिस्तानी फौज कर रही थी। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच पाकिस्तान खुद को एक “मीडिएटर” की शक्ल में पेश करना चाहता था, लेकिन ईरान ने कथित तौर पर पाक जनरल की नीयत और विश्वसनीयता पर एतबार नहीं किया। कमेंटेटर ने तो यहाँ तक कह डाला कि असीम मुनीर “दो मुँह वाला साँप” हैं जो एक तरफ अपने मुल्क में अवाम को कुचलते हैं और दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रम्प जैसे बाहरी खिलाड़ियों के हित साधने में लगे रहते हैं।
ये बयान सिर्फ एक शख्स की राय नहीं माना जा रहा बल्कि इसे उस बढ़ती धारणा से जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें पाकिस्तान की फौजी लीडरशिप की साख लगातार गिरती दिख रही है। खास तौर पर ऐसे वक्त में जब पाकिस्तान अंदरूनी सियासी उथल-पुथल, आर्थिक तबाही और अंतरराष्ट्रीय तन्हाई का सामना कर रहा है।
दिलचस्प बात ये है कि पाकिस्तान की सरकारी मीडिया और मिलिट्री प्रोपेगैंडा मशीन लगातार ये नैरेटिव बनाती रही है कि जनरल असीम मुनीर इस्लामी दुनिया में बेहद प्रभावशाली नेता हैं और कई मुल्क उनकी सलाह को अहमियत देते हैं। मगर ईरान जैसे अहम क्षेत्रीय खिलाड़ी की कथित बेरुख़ी ने इस दावे की हवा निकाल दी है। कश्मीर से लेकर खाड़ी मुल्कों तक, पाकिस्तानी चैनलों पर जो तस्वीर पेश की जाती है, वो अब बाहरी दुनिया में स्वीकार होती नज़र नहीं आ रही।
सियासी जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे अरसे से “स्ट्रैटेजिक डेप्थ” और “मुस्लिम उम्माह की लीडरशिप” जैसे नारों के सहारे अपनी क्षेत्रीय हैसियत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता आया है। लेकिन असलियत में चीन को छोड़ दें तो बहुत कम देश ऐसे हैं जो पाकिस्तान की फौजी हुकूमत पर खुलकर भरोसा करते हों। ईरान का यह रवैया उसी बढ़ते अविश्वास की निशानी माना जा रहा है।
उधर सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर पाकिस्तान के अंदर बहस तेज़ हो गई है। कई यूज़र्स सवाल उठा रहे हैं कि अगर पाकिस्तानी जनरल इतने ही असरदार और सम्मानित हैं तो फिर तेहरान, रियाद और अबूधाबी जैसे अहम कैपिटल्स में उन्हें वास्तविक राजनीतिक समर्थन क्यों नहीं मिल रहा। कुछ लोगों ने इसे “प्रोपेगैंडा बनाम रियलिटी” की सबसे बड़ी मिसाल करार दिया है।
माहिरीन का मानना है कि पाकिस्तान की फौज ने वर्षों तक मीडिया कंट्रोल, राष्ट्रवाद और भारत विरोधी नैरेटिव के सहारे अपनी छवि मजबूत बनाए रखी। मगर आज डिजिटल दौर में बाहरी दुनिया पाकिस्तान की अंदरूनी हक़ीक़त को करीब से देख रही है। बलूचिस्तान में असंतोष, पीओके में विरोध प्रदर्शन, आर्थिक गिरावट और राजनीतिक दमन जैसी घटनाओं ने पाकिस्तानी मिलिट्री की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाया है।
ईरान का यह कथित रुख़ इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि तेहरान आम तौर पर सार्वजनिक तौर पर पड़ोसी मुल्कों पर सीधे हमले से बचता है। ऐसे में अगर पाकिस्तानी टिप्पणीकारों के दावों में सच्चाई है तो यह इस्लामाबाद के लिए एक बड़ा कूटनीतिक झटका साबित हो सकता है।
फिलहाल पाकिस्तान की तरफ से इन दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन इतना जरूर साफ़ हो गया है कि “रीजनल पावर” का दावा करने वाला पाकिस्तान अब खुद अपनी साख बचाने की जंग लड़ता दिखाई दे रहा है। बाहर की दुनिया में पाकिस्तानी फौज की छवि उतनी मजबूत नहीं रह गई जितनी इस्लामाबाद के टीवी स्टूडियोज़ में दिखाई जाती है।
यानी हुज़ूर, कहानी अब साफ़ होती दिख रही है — प्रोपेगैंडा अपनी जगह, मगर हक़ीक़त अपनी जगह।

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