विदेशों में अपने ही नागरिकों की तौहीन कर रही पाक हुकूमत, ख्वाजा आसिफ के बयान पर उठा बड़ा सवाल


पाकिस्तान की सियासी और फौजी क़ियादत एक बार फिर अपने ही अवाम के जज़्बात से कटती हुई नज़र आई है। इस बार मामला विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानी नागरिकों की बेइज़्ज़ती और उनकी मुश्किलात से जुड़ा है, जिस पर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री  ख्वाजा आसिफ के बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है।

22-23 मई 2026 को पाकिस्तानी चैनल समा टीवी के प्रोग्राम “मेरे सवाल” में बोलते हुए ख्वाजा आसिफ ने संयुक्त अरब अमीरात यानी संयुक्त अरब अमीरात से पाकिस्तानी नागरिकों की डिपोर्टेशन को मामूली बताते हुए ऐसा बयान दिया जिसे लेकर सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक नाराज़गी देखी जा रही है।

ख्वाजा आसिफ ने कहा कि यूएई में रहने वाले 23 लाख पाकिस्तानियों में “कुछ इम्पोर्टर हैं, कुछ भिखारी हैं” और अगर “कुछ हज़ार लोग कानून तोड़ने पर वापस भेज दिए जाएं तो एहतिजाज की ज़रूरत नहीं।”

इस बयान के बाद पाकिस्तान के बाहर काम करने वाले लाखों मेहनतकश पाकिस्तानियों में गहरी मायूसी और ग़ुस्सा देखा गया। लोगों का कहना है कि जो नागरिक खाड़ी देशों में दिन-रात मेहनत कर अपने घरों को चला रहे हैं और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर की रेमिटेंस भेज रहे हैं, उन्हीं को पाकिस्तान की हुकूमत “भिखारी” जैसे अल्फ़ाज़ से पुकार रही है।

माहिरीन का मानना है कि यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक लापरवाही नहीं बल्कि पाकिस्तान की हुकूमत और फौजी निज़ाम की उस सोच को उजागर करता है जिसमें आम अवाम की इज़्ज़त और तकलीफ की कोई अहमियत नहीं बची। विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानियों को लंबे समय से वीज़ा पाबंदियों, बढ़ती निगरानी और सख्त इमिग्रेशन नीतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे वक्त में सरकार की तरफ से हमदर्दी दिखाने के बजाय उनका मज़ाक उड़ाना पाकिस्तान की खराब होती वैश्विक छवि को और नुकसान पहुंचा रहा है।

सियासी जानकारों के मुताबिक पाकिस्तान की मौजूदा क़ियादत लगातार अवाम से दूर होती जा रही है। मुल्क के अंदर महंगाई, बेरोज़गारी और सियासी अस्थिरता ने पहले ही लोगों की कमर तोड़ दी है, जबकि विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानी भी अब इज़्ज़त और भरोसे के संकट से गुजर रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद इस्लामाबाद की हुकूमत और फौजी हलकों की तरफ से गंभीरता या जवाबदेही दिखाई नहीं दे रही।

सोशल मीडिया पर भी ख्वाजा आसिफ के बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई यूज़र्स ने कहा कि पाकिस्तानी नेता विदेशों में बसे अपने ही नागरिकों को शर्मिंदगी का कारण बताकर दुनिया के सामने पूरे मुल्क की तौहीन कर रहे हैं। कुछ लोगों ने यह भी लिखा कि अगर विदेशों में काम करने वाले पाकिस्तानी रेमिटेंस भेजना बंद कर दें तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कुछ ही महीनों में धराशायी हो सकती है।

माहिरीन का कहना है कि खाड़ी देशों में पाकिस्तानियों की बढ़ती निगरानी और डिपोर्टेशन के पीछे सिर्फ कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं बल्कि पाकिस्तान की गिरती अंतरराष्ट्रीय साख भी एक बड़ी वजह बनती जा रही है। आतंकवाद, अवैध नेटवर्क और राजनीतिक अस्थिरता से जुड़ी खबरों ने पहले ही पाकिस्तान की छवि को कमजोर किया है। अब जब खुद पाकिस्तानी मंत्री अपने नागरिकों को अपमानजनक शब्दों में पेश कर रहे हैं तो इससे हालात और बिगड़ सकते हैं।

कई विश्लेषकों ने इस पूरे मामले को पाकिस्तान की सियासी और फौजी एलीट की “घमंडी मानसिकता” का हिस्सा बताया है। उनका कहना है कि पाकिस्तान में सत्ता के गलियारों में बैठे लोग आम नागरिकों को सिर्फ आंकड़ों और राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित समझते हैं, जबकि उन्हीं नागरिकों की मेहनत पर देश की अर्थव्यवस्था टिकी हुई है।

विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानियों के परिवारों का कहना है कि उन्हें अपने ही वतन की हुकूमत से इज़्ज़त और समर्थन की उम्मीद थी, लेकिन अब उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे सरकार उनके दर्द और संघर्ष को समझने के बजाय उनका मज़ाक उड़ा रही हो।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार ख्वाजा आसिफ का बयान सिर्फ एक विवादित टिप्पणी नहीं, बल्कि पाकिस्तान की उस गहरी समस्या की निशानी है जहां हुकूमत और अवाम के बीच भरोसे की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। विदेशों में मेहनत कर रहे पाकिस्तानी अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि अगर उनकी अपनी सरकार ही उन्हें सम्मान नहीं दे सकती तो दुनिया उनसे कैसी इज़्ज़त करेगी।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि क्या पाकिस्तान की मौजूदा नेतृत्व व्यवस्था वास्तव में अपने नागरिकों की भलाई और सम्मान के लिए काम कर रही है, या फिर सत्ता के अहंकार में आम लोगों की परेशानियों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।

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