मुज़फ्फराबाद में हमज़ा बुरहान उर्फ “डॉक्टर” की मौत केवल एक और आतंकी के मारे जाने की घटना नहीं है। यह कश्मीर की उस कड़वी सच्चाई की याद दिलाती है जिसने दशकों से घाटी को परेशान कर रखा है — पाकिस्तान की आतंकी मशीनरी द्वारा कश्मीरी युवाओं का लगातार शोषण। नारों, प्रचार और भावनात्मक कहानियों के पीछे एक बेहद खतरनाक सच छिपा हुआ है। कई कश्मीरी युवक जिन्हें आतंकवाद की ओर धकेला जाता है, अंततः एक बड़े प्रॉक्सी युद्ध के इस्तेमाल होने वाले मोहरे बनकर रह जाते हैं। उनकी ज़िंदगी झूठे वादों, कट्टरपंथी सोच और मानसिक छलावे में उलझ जाती है, जबकि हिंसा की असली योजना बनाने वाले लोग कश्मीर की तबाही से बहुत दूर सुरक्षित बैठे रहते हैं।
सालों से पाकिस्तान और उसके समर्थन प्राप्त नेटवर्क कश्मीर में आतंकवाद को एक “मकसद” और “कुर्बानी” की लड़ाई के रूप में पेश करते आए हैं। लेकिन उन आतंकियों की कहानियाँ जो पाकिस्तान या पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों में गए, एक बिल्कुल अलग सच सामने लाती हैं। उन्हें भर्ती किया जाता है, कट्टरपंथ की ओर मोड़ा जाता है, प्रशिक्षण दिया जाता है और फिर रणनीतिक जरूरतों के अनुसार इस्तेमाल किया जाता है। जब उनकी उपयोगिता खत्म हो जाती है, तो कई लोग गायब हो जाते हैं, चुप करा दिए जाते हैं या रहस्यमयी परिस्थितियों में मारे जाते हैं। जिन्हें कभी “प्रतिरोध” का प्रतीक बताया जाता था, बाद में वही लोग भुला दिए जाते हैं।
हमज़ा बुरहान की कहानी भी इसी दर्दनाक सच्चाई को दर्शाती है। पुलवामा के रत्नीपोरा इलाके का रहने वाला हमज़ा वर्ष 2017 में कथित तौर पर उच्च शिक्षा के बहाने पाकिस्तान गया था। लेकिन वहां जाकर वह आतंकी संगठन अल-बद्र में शामिल हो गया और धीरे-धीरे उसकी गतिविधियों में सक्रिय हो गया। समय के साथ वह कश्मीर से जुड़ी आतंकी गतिविधियों में शामिल रहा और वर्ष 2022 में भारत ने उसे आतंकवादी घोषित कर दिया। लेकिन लगभग एक दशक बाद उसकी मौत कश्मीर में नहीं बल्कि मुज़फ्फराबाद में अज्ञात बंदूकधारियों के हाथों हुई। उसकी रहस्यमयी हत्या कई सवाल खड़े करती है, खासकर उन आतंकियों के भविष्य को लेकर जिन्हें पाकिस्तान में पनाह दी जाती है और बाद में वही सिस्टम उन्हें खत्म कर देता है।
उसकी मौत एक और गहरी और परेशान करने वाली सच्चाई को सामने लाती है। पाकिस्तान की प्रॉक्सी वॉर ने बार-बार उन्हीं कश्मीरी युवाओं को निगला है जिनके समर्थन का दावा किया जाता है। घाटी के संवेदनशील युवाओं को भावनात्मक प्रचार, कट्टरपंथी विचारधारा, सोशल मीडिया के जरिए फैलाए गए झूठे महिमामंडन और फर्जी शहादत की कहानियों से प्रभावित किया जाता रहा है। उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि सीमा पार जाकर आतंकी संगठनों में शामिल होना उनकी जिंदगी को सम्मान, पहचान और मकसद देगा।
लेकिन असलियत उन सपनों से बिल्कुल अलग होती है जो उन्हें दिखाए जाते हैं। एक बार भर्ती होने के बाद उनकी जिंदगी उनके अपने नियंत्रण में नहीं रहती। उन्हें हथियार दिए जाते हैं, प्रशिक्षित किया जाता है और रणनीतिक जरूरतों के अनुसार इस्तेमाल किया जाता है। जो लोग इन नेटवर्कों को नियंत्रित करते हैं, वे खुद कभी खतरे में नहीं आते। कुर्बानी हमेशा कश्मीरी युवक देता है — अपनी पढ़ाई, अपना भविष्य, अपना परिवार और अंततः अपनी जान।
कई युवक कभी अपने घर वापस नहीं लौट पाते। कुछ मुठभेड़ों में मारे जाते हैं, जबकि कुछ पाकिस्तान या पीओके पहुंचने के बाद रहस्यमयी परिस्थितियों में गायब हो जाते हैं। वर्षों में कई ऐसे आतंकी संदिग्ध परिस्थितियों में मारे गए हैं। कुछ अज्ञात हमलावरों के हाथों, तो कुछ आपसी दुश्मनी और अविश्वास के कारण। यह एक खतरनाक पैटर्न को दर्शाता है — वही सिस्टम जो पहले इन युवाओं का महिमामंडन करता है, बाद में उन्हें बोझ समझकर छोड़ देता है।
यही इस पूरे चक्र की सबसे बड़ी त्रासदी है। कश्मीरी युवाओं को सम्मान, सुरक्षा और गौरव का सपना दिखाया जाता है, लेकिन वास्तव में वे इस्तेमाल होने वाले मोहरे बनकर रह जाते हैं। उनकी मौत कुछ समय के लिए सुर्खियां बनती है और फिर दुनिया उन्हें भूल जाती है। सबसे ज्यादा दर्द उन परिवारों को झेलना पड़ता है जो अपने बच्चों को हमेशा के लिए खो देते हैं। पुलवामा की एक मां अपने बेटे की राह देखते-देखते उम्र गुजार देती है। एक पिता वर्षों तक इस उम्मीद में जीता है कि शायद उसका बेटा लौट आए।
इसी वजह से आज कश्मीर में कई लोग आतंकवाद को किसी समाधान के रूप में नहीं बल्कि एक दुखद जाल के रूप में देखने लगे हैं। बंदूक का आकर्षण धीरे-धीरे वास्तविकता के बोझ तले कमजोर पड़ रहा है। नई पीढ़ी अब अलग सवाल पूछ रही है और अलग सपने देख रही है।
आज कश्मीर के युवा शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, उद्यमिता, खेल और तकनीक की ओर बढ़ रहे हैं। घाटी के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। पर्यटन फिर से बढ़ रहा है, व्यवसाय विकसित हो रहे हैं और युवा नवाचार के जरिए कश्मीर की नई पहचान बना रहे हैं जो हिंसा से अलग है।
आज का कश्मीरी युवा विनाश नहीं बल्कि अवसरों के जरिए सम्मान चाहता है। उसने इतना खून-खराबा देखा है कि वह समझ चुका है कि हिंसा कभी वह नहीं देती जो उसका वादा किया जाता है। कई आतंकियों का दुखद अंत इस बात की याद दिलाता है कि बंदूक का रास्ता अक्सर कब्रों, टूटे घरों और भुला दिए गए नामों तक ही जाता है।
मुज़फ्फराबाद में हमज़ा बुरहान की मौत इसी विश्वासघात का प्रतीक बनकर सामने आती है। यह सशक्तिकरण नहीं बल्कि शोषण की कहानी है। पुलवामा से पाकिस्तान तक का उसका सफर किसी गौरव पर नहीं बल्कि रहस्य, अकेलेपन और मौत पर खत्म हुआ — अपने घर से बहुत दूर।
शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा सबक है। पाकिस्तान की प्रॉक्सी रणनीति ने बार-बार कश्मीरी युवाओं को एक ऐसे संघर्ष का हथियार बनाया है जिसका सबसे बड़ा दर्द कश्मीर के परिवारों ने झेला है। नारे और प्रचार बदलते रहे, लेकिन परिणाम अक्सर वही रहा — हिंसा, तबाही और बर्बादी।
कश्मीर का भविष्य अब इस चक्र पर नहीं बन सकता। उसका भविष्य शिविरों में नहीं बल्कि कक्षाओं में है, गोलियों में नहीं बल्कि किताबों में है, कट्टरता में नहीं बल्कि नवाचार में है, और नफरत में नहीं बल्कि उम्मीद में है। तभी कश्मीर वास्तव में उस शोषण की छाया से बाहर निकल पाएगा जिसने पीढ़ियों को तबाह किया है।

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