
लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी बयान कर रही है। बलोचिस्तान में पिछले कई सालों से लोगों की गुमशुदगियाँ, फौजी ऑपरेशन, जबरी गिरफ्तारियाँ और इंसानी हुकूक की खुलेआम खिलाफ़वर्ज़ियाँ लगातार सामने आती रही हैं। स्थानीय बलोच तंजीमें और ह्यूमन राइट्स ग्रुप्स बार-बार यह इल्ज़ाम लगाते आए हैं कि पाक फौज और सिक्योरिटी एजेंसियाँ आवाज़ उठाने वालों को दबाने के लिए सख़्त कार्रवाई करती हैं।
बलोच नौजवानों, स्टूडेंट्स और सियासी एक्टिविस्ट्स की “मिसिंग पर्सन्स” की लंबी फेहरिस्त आज भी पाकिस्तान सरकार के लिए बड़ा सवाल बनी हुई है। कई खानदान सालों से अपने लापता अफराद की तलाश में सड़कों पर एहतिजाज कर रहे हैं। मगर इस पूरे मसले पर जवाब देने के बजाय इस्लामाबाद अक्सर हिंदुस्तान पर इल्ज़ाम डालकर अपनी नाकामियों से ध्यान हटाने की कोशिश करता दिखाई देता है।
माहिरीन का कहना है कि पाकिस्तान की हुकूमत बलोचिस्तान के असल मुद्दों — जैसे बेरोजगारी, तालीमी पिछड़ापन, गैस और खनिज दौलत पर स्थानीय लोगों के हक़, और सियासी नुमाइंदगी — पर बात करने से कतराती रही है। सूबे के लोग बरसों से शिकायत करते आए हैं कि उनके इलाके की दौलत तो पूरे पाकिस्तान में इस्तेमाल होती है, लेकिन खुद बलोचिस्तान बुनियादी सहूलतों से महरूम है।
कई इंटरनेशनल रिपोर्ट्स में भी यह बात सामने आई है कि बलोचिस्तान में फौजी मौजूदगी बढ़ने के बाद आम नागरिकों पर दबाव और ज्यादा बढ़ा। मीडिया की आज़ादी पर पाबंदियाँ और पत्रकारों को डराने-धमकाने के मामले भी लगातार सामने आते रहे हैं। ऐसे माहौल में पाकिस्तान का हर मसले का जिम्मेदार हिंदुस्तान को ठहराना उसकी “क्रेडिबिलिटी गैप” को और ज्यादा उजागर करता है।
सियासी जानकारों का मानना है कि “इंडिया कार्ड” पाकिस्तान में कोई नई चीज़ नहीं है। जब भी मुल्क के अंदर सियासी या अमनी हालात खराब होते हैं, तब अवाम का ध्यान हटाने के लिए हिंदुस्तान के खिलाफ बयानबाज़ी तेज कर दी जाती है। बलोचिस्तान के मामले में भी यही रणनीति अपनाई जा रही है।
वीडियो में यह नैरेटिव पेश करने की कोशिश की गई कि बलोचिस्तान की आवाज़ दरअसल बाहरी ताकतों द्वारा चलाई जा रही मुहिम है। मगर हक़ीक़त यह है कि बलोच लोगों की शिकायतें दशकों पुरानी हैं। स्थानीय लोग अपने हुकूक, रोजगार, तालीम और इज्ज़त के साथ जीने की मांग कर रहे हैं। इन आवाज़ों को विदेशी साजिश बताकर दबाने की कोशिश पाकिस्तान की अंदरूनी कमजोरी को जाहिर करती है।
उधर सोशल मीडिया पर भी पाकिस्तान सरकार और फौज को कड़ी तनकीद का सामना करना पड़ रहा है। कई यूज़र्स का कहना है कि अगर बलोचिस्तान में सब कुछ ठीक है, तो फिर वहां इंटरनेट बंदी, मीडिया कंट्रोल और सिक्योरिटी ऑपरेशन्स की जरूरत क्यों पड़ती है। लोगों का सवाल है कि आखिर क्यों हर विरोध करने वाले को “विदेशी एजेंट” करार दिया जाता है।
माहिरीन यह भी मानते हैं कि पाकिस्तान की यह रणनीति इंटरनेशनल लेवल पर अब ज्यादा असरदार साबित नहीं हो रही। दुनिया भर की ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन्स बलोचिस्तान में इंसानी हुकूक की हालत पर चिंता जता चुकी हैं। ऐसे में बिना ठोस सबूतों के भारत पर इल्ज़ाम लगाना पाकिस्तान की साख को और कमजोर करता है।
बलोचिस्तान का मसला केवल सिक्योरिटी का नहीं, बल्कि इंसाफ, हुकूक और भरोसे का मसला बन चुका है। मगर अफसोस, पाकिस्तान की हुकूमत अब भी असल मुद्दों को हल करने के बजाय “बाहरी दुश्मन” का नैरेटिव बेचने में मशगूल दिखाई देती है। और यही वजह है कि “प्रोपेगेंडा बनाम हक़ीक़त” की इस जंग में पाकिस्तान का दावा लगातार सवालों के घेरे में आ रहा है।

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