
मालूम हुआ है कि ISPR ने कॉलेज और यूनिवर्सिटी के मासूम स्टूडेंट्स को भी अपने इस “प्रोपेगेंडा फैक्ट्री” का हिस्सा बना रखा है। नौजवानों को डिजिटल ट्रेनिंग, ऑनलाइन इंटर्नशिप और मीडिया एक्सपोज़र के नाम पर भर्ती किया जाता है, लेकिन असल मकसद सोशल मीडिया पर फौज के हक़ में माहौल बनाना और हक़ीक़त को छुपाना होता है। कई स्टूडेंट्स को ये तक नहीं पता होता कि वो एक संगठित दुष्प्रचार अभियान का हिस्सा बन चुके हैं।
रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि पाकिस्तानी फौज के सोशल मीडिया सेल्स बाकायदा ट्रेंड्स चलाते हैं, फेक अकाउंट्स बनाते हैं और विरोधी आवाज़ों को दबाने के लिए ऑनलाइन हमले करवाते हैं। एक्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर हजारों पोस्ट एक तयशुदा नैरेटिव के तहत फैलाए जाते हैं। इन पोस्ट्स का मकसद पाकिस्तान की अंदरूनी नाकामियों — जैसे आर्थिक बदहाली, आतंकवाद, बेरोज़गारी और सियासी अफरा-तफरी — से अवाम का ध्यान हटाना होता है।
जानकारों का कहना है कि ISPR अब सिर्फ पारंपरिक मीडिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने सोशल मीडिया को एक “डिजिटल हथियार” में तब्दील कर दिया है। फौज के करीबी नेटवर्क युवाओं को देशभक्ति और मीडिया करियर का सपना दिखाकर अपने ऑनलाइन ऑपरेशन्स में शामिल करते हैं। इसके बाद इनसे फर्जी खबरें, एडिटेड वीडियो और भ्रामक पोस्ट शेयर करवाई जाती हैं। कई बार विदेशी मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मामलों को लेकर भी झूठे नैरेटिव फैलाए जाते हैं ताकि पाकिस्तान की छवि को बेहतर दिखाया जा सके।
तजज़िया करने वालों का मानना है कि पाकिस्तानी फौज की ये रणनीति सिर्फ घरेलू अवाम तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी गुमराह करने की कोशिश करती है। सोशल मीडिया पर चलाए जा रहे इन कोऑर्डिनेटेड कैंपेन का इस्तेमाल कश्मीर, आतंकवाद और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर झूठी तस्वीर पेश करने के लिए भी किया जाता है। मगर डिजिटल दौर में सच्चाई ज़्यादा देर तक छुप नहीं पाती और अब धीरे-धीरे ISPR की ये “फ़ेक न्यूज़ फ़ैक्ट्री” दुनिया के सामने उजागर हो रही है।
माहिरों ने चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया का इस तरह इस्तेमाल लोकतंत्र, पारदर्शिता और स्वतंत्र मीडिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। जब फौज खुद नैरेटिव कंट्रोल करने लगे और युवाओं को दुष्प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो इससे समाज में भ्रम और नफरत फैलने का खतरा बढ़ जाता है। पाकिस्तान के अंदर भी कई लोग अब सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर मुल्क की फौज अवाम के टैक्स का पैसा ऑनलाइन प्रोपेगेंडा और फेक कैंपेन पर क्यों खर्च कर रही है, जबकि देश आर्थिक संकट और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है।
सियासी जानकारों का कहना है कि पाक आर्मी की ये “ऑनलाइन इंजीनियरिंग” उसकी बढ़ती बेचैनी को भी दिखाती है। जमीनी हकीकत और अवाम के गुस्से से ध्यान हटाने के लिए सोशल मीडिया को हथियार बनाया जा रहा है। लेकिन लगातार सामने आ रही रिपोर्ट्स ने ये साबित कर दिया है कि पाकिस्तान की फौज अब सिर्फ सरहदों तक सीमित नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी “नैरेटिव वॉर” लड़ रही है — जहां सच को दबाकर झूठ को फैलाना ही उसका सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।

0 टिप्पणियाँ