ये त्योहार हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम (A.S.) की उस अज़ीम कुर्बानी की याद दिलाता है, जब उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर अपने प्यारे बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम (A.S.) को कुर्बान करने का इरादा किया। लेकिन अल्लाह तआला ने उनकी इस अज़ीम फ़रमाबरदारी को क़ुबूल करते हुए हज़रत इस्माईल (A.S.) की जगह एक दुम्बा भेज दिया। यही वाक़िया क़यामत तक ईमान, सब्र और अल्लाह की रज़ा में राज़ी रहने की मिसाल बन गया। ईद-उल-जुहा मुसलमानों को सिखाती है कि असली कुर्बानी अपने नफ़्स, लालच, घमंड और बुरी ख्वाहिशों को छोड़कर इंसानियत और नेक रास्ते को अपनाने में है।
ईद से कुछ दिन पहले ही कश्मीर के बाज़ारों में रौनक बढ़ जाती है। लोग नए कपड़े, बेकरी आइटम, मसाले और कुर्बानी के जानवर खरीदने के लिए बाज़ारों का रुख करते हैं। कश्मीर की मशहूर पारंपरिक बेकरी, जिन्हें “कंदूर” कहा जाता है, सुबह से शाम तक व्यस्त रहती हैं। लोग कुलचा, बाक़रख़ानी और शीरमाल जैसी चीज़ें मेहमानों और घरवालों के लिए खरीदते हैं। लाल चौक और डाउनटाउन श्रीनगर जैसे इलाकों में ख़ास चहल-पहल देखने को मिलती है। घरों की सफाई और सजावट की जाती है जबकि बच्चे बेसब्री से ईद का इंतज़ार करते हैं।
ईद की सुबह हजारों लोग मस्जिदों और ईदगाहों में नमाज़ अदा करने के लिए जमा होते हैं। मर्द, औरतें और बच्चे फ़ेरन और पठानी सूट जैसे पारंपरिक कपड़े पहनते हैं। चारों तरफ़ रूहानी माहौल बन जाता है और लोग एक-दूसरे को “ईद मुबारक” कहकर मुहब्बत और भाईचारे का पैग़ाम देते हैं। हज़रतबल दरगाह और ईदगाह श्रीनगर जैसी जगहों पर बड़ी तादाद में लोग नमाज़ के लिए इकट्ठा होते हैं। वादियों में गूंजती तकबीरें और दुआएँ दिलों को सुकून और अमन का एहसास कराती हैं।
कुर्बानी ईद-उल-जुहा का सबसे अहम हिस्सा होती है। लोग इस्लामी तालीमात के मुताबिक जानवरों की कुर्बानी करते हैं और उसका गोश्त रिश्तेदारों, पड़ोसियों और गरीब परिवारों में तक्सीम करते हैं। कुर्बानी का असली मक़सद दूसरों की खुशियों में शामिल होना और ज़रूरतमंदों की मदद करना है। कश्मीर में कई लोग ख़ास तौर पर यतीमों, बेवाओं और गरीब परिवारों का ख़याल रखते हैं ताकि वो भी ईद की खुशियों में शरीक हो सकें। यही जज़्बा इंसानियत, रहमदिली और भाईचारे को मज़बूत करता है।
बकरा ईद के दौरान खाने-पीने की अपनी अलग ही रौनक होती है। घरों में स्वादिष्ट कश्मीरी पकवान तैयार किए जाते हैं और मेहमानों की खूब खातिरदारी की जाती है। रोगन जोश, यख़नी और गश्ताबा जैसे मशहूर कश्मीरी व्यंजन खास तौर पर बनाए जाते हैं। मेहमानों को खुशबूदार कहवा पेश किया जाता है जो त्योहार की रौनक को और बढ़ा देता है। कई घरों में पारंपरिक वाज़वान का भी एहतिमाम किया जाता है जहाँ रिश्तेदार और दोस्त साथ बैठकर खुशियाँ मनाते हैं।
मज़हबी रस्मों के अलावा ईद-उल-जुहा कश्मीर में सामाजिक और सांस्कृतिक यकजहती को भी मज़बूत करती है। ये त्योहार परिवारों को करीब लाता है और रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के बीच मोहब्बत को फिर से ताज़ा कर देता है। बच्चे बड़ों से ईदी लेते हैं और पूरे दिन खुशियों का माहौल बना रहता है। मुश्किल हालात में भी ईद लोगों को उम्मीद, एकता और भाईचारे का पैग़ाम देती है। ये त्योहार कश्मीर की उस खूबसूरत तहज़ीब को दिखाता है जहाँ मज़हब, रिवायत और मेहमाननवाज़ी साथ-साथ चलती हैं।
ईद-उल-जुहा सिर्फ कुर्बानी का त्योहार नहीं बल्कि रहम, सादगी, शुक्रगुज़ारी और अल्लाह की इबादत का भी पैग़ाम है। ये इंसान को सिखाती है कि दूसरों का ख़याल रखें, इंसानी क़दरें समझें और अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करें। कश्मीर में ये त्योहार मज़हबी अकीदे और सांस्कृतिक रिवायतों का खूबसूरत संगम पेश करता है, जो अमन, मोहब्बत और भाईचारे की मिसाल बन जाता है। दुआ है कि ये मुबारक त्योहार कश्मीर समेत पूरी दुनिया में खुशियाँ, अमन और इंसानियत का पैग़ाम फैलाता रहे।

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