ईद की आड़ में आतंक का कारोबार — जैश-ए-मोहम्मद ने करोड़ों की फंडिंग से फिर बेनकाब किया पाकिस्तान का चेहरा


इस्लामाबाद/मज़फ्फराबाद: पाकिस्तान एक बार फिर दुनिया के सामने आतंकवाद के सबसे बड़े पनाहगाह के तौर पर उजागर हुआ है। ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ईद-उल-अज़हा 2026 के मौके पर बड़े पैमाने पर चंदा इकट्ठा कर उसे आतंक नेटवर्क, कट्टरपंथी गतिविधियों और सीमा पार आतंकवाद को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किया।

मिली जानकारी के मुताबिक जैश-ए-मोहम्मद ने इस साल ईद के नाम पर 40 करोड़ पाकिस्तानी रुपये से ज्यादा की रकम जमा की। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि इस रकम का एक हिस्सा गाज़ा भेजा गया, जबकि बाकी रकम पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) में सक्रिय जैश नेटवर्क और मारे गए आतंकियों के परिवारों तक पहुंचाई जा रही है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ “कुर्बानी” या “मदद” का मामला नहीं, बल्कि धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल कर आतंकवाद को आर्थिक सहारा देने की एक सुनियोजित रणनीति है। पाकिस्तान लंबे समय से ऐसे संगठनों को खुली या छिपी मदद देता रहा है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।

सूत्रों के अनुसार जैश-ए-मोहम्मद ने लगभग 4.62 करोड़ पाकिस्तानी रुपये गाज़ा ट्रांसफर किए, जहां कथित तौर पर कुर्बानी के जानवरों के नाम पर सहायता पहुंचाई गई। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इस प्रक्रिया के जरिए कट्टरपंथी नेटवर्क और आतंकी संगठनों को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया जा रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि “इंसानी मदद” और “मजहबी खिदमत” के नाम पर फंडिंग जुटाना अब पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों की आम रणनीति बन चुकी है। इससे पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में खुलासा हो चुका है कि पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी नेटवर्क धार्मिक मौकों, मदरसों और चैरिटी अभियानों का इस्तेमाल कर धन जुटाते हैं।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि ईद के मौके पर हजारों कुर्बानी के जानवर जैश से जुड़े लोगों में बांटे जाएंगे। बताया जा रहा है कि 5,000 से ज्यादा जैश-ए-मोहम्मद कैडरों और मारे गए आतंकियों के परिवारों को यह “सहायता” दी जाएगी। सुरक्षा मामलों के जानकारों के मुताबिक यह कदम आतंकी ढांचे को जिंदा रखने और नए युवाओं को संगठन से जोड़ने की कोशिश है।

PoK और पाकिस्तान के कई इलाकों में जैश-ए-मोहम्मद के स्थानीय नेटवर्क कथित तौर पर खुलेआम फंड कलेक्शन अभियान चला रहे हैं। मस्जिदों, धार्मिक सभाओं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए लोगों से “ईद कुर्बानी” और “मजहबी फर्ज़” के नाम पर पैसे मांगे जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की सत्ता और सुरक्षा ढांचे की नरमी के बिना इतने बड़े स्तर पर फंडिंग संभव नहीं है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की छवि लगातार “टेरर फाइनेंसिंग हब” के रूप में मजबूत होती जा रही है।

दक्षिण एशिया मामलों के जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान बार-बार आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई का दावा करता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई देती है। आतंकी संगठनों के खिलाफ दिखावटी कार्रवाई के बावजूद उनके आर्थिक नेटवर्क लगातार सक्रिय हैं।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर पाकिस्तान कब तक धार्मिक आयोजनों और मानवीय सहायता की आड़ में आतंकवाद को पालता रहेगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले ही पाकिस्तान से आतंकी संगठनों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करता रहा है, लेकिन हर बार नए तरीके से आतंकी नेटवर्क फिर सामने आ जाते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि ईद जैसे पवित्र त्योहार का इस्तेमाल आतंकवाद के लिए धन जुटाने में करना न सिर्फ इस्लामी मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि यह क्षेत्रीय अमन और इंसानियत दोनों के लिए बड़ा खतरा है।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर पाकिस्तान को “आतंकवाद के एपिसेंटर” के रूप में बेनकाब कर दिया है, जहां धार्मिक भावनाओं को भड़का कर कट्टरपंथ और सीमा पार आतंकवाद को आर्थिक ताकत दी जा रही है।

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