दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि इंसान की असली कामयाबी दूसरों को नीचा दिखाने में नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को दूर करने में है। रावण का पुतला जलने के साथ हमें अपने दिलों से नफरत, घमंड, गलतफहमी और आपसी दूरी को भी मिटाने का संकल्प लेना चाहिए। अगर हम इस संदेश को अपनी ज़िंदगी में उतार लें, तो हमारा समाज पहले से ज्यादा मजबूत, शांतिपूर्ण और खुशहाल बन सकता है।
श्रीनगर में इस आयोजन की खूबसूरती केवल रंग-बिरंगे पुतलों और लोगों की भीड़ में नहीं थी, बल्कि उस भावना में थी जो अलग-अलग समुदायों के लोगों को एक जगह लेकर आई। जब स्थानीय कारीगर मिलकर किसी त्योहार की तैयारी करते हैं, जब परिवार एक साथ खुशियाँ मनाते हैं और जब लोग एक-दूसरे की परंपराओं को सम्मान देते हैं, तो समाज में भरोसे की बुनियाद मजबूत होती है। यही वह कश्मीरियत है जिसकी पहचान इंसानियत, तहज़ीब, मेहमाननवाज़ी और एक-दूसरे के दुख-सुख में शरीक होने की परंपरा से जुड़ी रही है।
कश्मीर के नौजवानों के लिए इस आयोजन में एक अहम सबक छिपा है। नौजवान किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। उनके विचार, मेहनत और फैसले आने वाली पीढ़ियों का रास्ता तय करते हैं। अगर युवा अपने पड़ोसियों, सहपाठियों और साथ काम करने वालों के मज़हब से ऊपर उठकर उन्हें इंसान के रूप में देखेंगे, तो समाज में गलतफहमियों और दूरियों के लिए जगह कम होगी। किसी के त्योहार का सम्मान करना अपनी पहचान को छोड़ना नहीं, बल्कि अपने किरदार को और बुलंद करना है। मोहब्बत बाँटने से कम नहीं होती, बल्कि और बढ़ती है।
हमारी वादी में रोज़गार, शिक्षा, पर्यटन और तरक्की के अनेक अवसर मौजूद हैं। इन अवसरों का पूरा फायदा तभी उठाया जा सकता है, जब समाज में भरोसा और सहयोग कायम रहे। स्थानीय कारीगरों की मेहनत इस बात की याद दिलाती है कि हुनर की कोई धार्मिक सीमा नहीं होती। लकड़ी पर नक्काशी करने वाला हाथ हो, पुतले तैयार करने वाला कारीगर हो या किसी बच्चे को तालीम देने वाला शिक्षक, हर मेहनतकश इंसान समाज की तरक्की में अपना हिस्सा डालता है। अगर कश्मीर के युवा एक-दूसरे के हुनर को पहचानें, मिलकर कारोबार शुरू करें, नए विचार अपनाएँ और जरूरतमंदों की मदद करें, तो वे अपनी वादी के भविष्य को और रोशन बना सकते हैं।
यह भी जरूरी है कि भाईचारा केवल त्योहारों तक सीमित न रहे। असली एकता तब दिखाई देती है, जब किसी परिवार पर मुश्किल आती है और पड़ोसी उसकी मदद के लिए आगे बढ़ता है, जब किसी बच्चे को शिक्षा की जरूरत होती है और समाज उसके लिए रास्ता बनाता है, और जब किसी नौजवान को काम की तलाश होती है तो लोग उसे सही मार्गदर्शन देते हैं। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर अपने-अपने तरीके से इंसान को नेकी, रहमदिली और सेवा की सीख देते हैं। इन साझा मानवीय मूल्यों को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना ही सच्ची सामाजिक तरक्की है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को नफरत की कहानियाँ नहीं, बल्कि दोस्ती और सहयोग की मिसालें दें। बच्चों को सिखाएँ कि किसी के धर्म, भाषा या पहनावे के आधार पर उसके बारे में राय नहीं बनानी चाहिए। सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने के बजाय सच्चाई की पुष्टि करें और किसी विवाद को बढ़ाने के बजाय बातचीत से हल निकालने की कोशिश करें। छोटी-छोटी नेकियाँ मिलकर बड़े बदलाव का रास्ता बनाती हैं।
श्रीनगर में दशहरे का यह आयोजन हमें यही पैगाम देता है कि कश्मीर की असली खूबसूरती केवल उसकी वादियों, बर्फ से ढके पहाड़ों और डल झील की लहरों में नहीं, बल्कि यहाँ के लोगों के दिलों में भी बसती है। हमारी पहचान तब और मजबूत होती है, जब हम एक-दूसरे की खुशियों में शामिल होते हैं और मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। आइए, हम सब मिलकर ऐसा कश्मीर बनाने का संकल्प लें जहाँ हर मज़हब के इंसान को सम्मान मिले, हर बच्चे को आगे बढ़ने का मौका मिले और हर परिवार अमन व भरोसे के साथ ज़िंदगी गुज़ार सके। क्योंकि जब दिल मिलते हैं, तो दूरियाँ मिटती हैं; जब हाथ मिलते हैं, तो तरक्की के रास्ते खुलते हैं; और जब इंसानियत सबसे ऊपर होती है, तो पूरी वादी मोहब्बत, अमन और भाईचारे की मिसाल बन जाती है। यही कश्मीर का उज्ज्वल कल है और यही हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।


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