बडगाम के छात्र ज़ाहिद मंज़ूर की नशा-मुक्त कश्मीर की पहल, 48 मिनट की फ़िल्म से दे रहे पैग़ाम


कश्मीर घाटी में नशे के बढ़ते चलन के ख़िलाफ़ अब स्कूली बच्चे भी अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। ज़िला बडगाम के दसवीं जमात के छात्र ज़ाहिद मंज़ूर ने नशाख़ोरी के ख़िलाफ़ जागरूकता फैलाने के लिए एक अनोखी पहल शुरू की है। अपने निजी संघर्षों को ताक़त बनाकर ज़ाहिद ने अपने उस्ताद यूसुफ़ के साथ मिलकर 48 मिनट की एक फ़िल्म तैयार की है, जिसे अब कश्मीर के अलग-अलग स्कूलों में दिखाया जा रहा है। इस फ़िल्म का मक़सद बच्चों और नौजवानों को नशे के ख़तरों से आगाह करना और उन्हें एक बेहतर मुस्तकबिल की तरफ़ ले जाने के लिए प्रेरित करना है।

ज़ाहिद मंज़ूर की कोशिश इस मायने में ख़ास है कि वह नशे के मसले को केवल एक सामाजिक समस्या के तौर पर नहीं, बल्कि नौजवानों की ज़िंदगी, उनके ख़्वाबों और उनके मुस्तकबिल से जुड़े एक अहम मुद्दे के रूप में सामने ला रहे हैं। उन्होंने अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने के लिए फ़िल्म जैसे प्रभावशाली माध्यम का सहारा लिया है, ताकि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे इस मसले को समझ सकें और इसके गंभीर नतीजों के बारे में सोचने पर मजबूर हों।

ज़ाहिद का एक बयान इस पूरी पहल का पैग़ाम साफ़ तौर पर सामने लाता है। उनका कहना है, “दिव्यांगता मुझमें नहीं है, बल्कि उन लोगों में है जो नशा कर रहे हैं।” उनका यह विचार नशाख़ोरी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत संदेश देता है और समाज को अपनी सोच पर ग़ौर करने की दावत देता है। ज़ाहिद की बात इस तरफ़ भी ध्यान दिलाती है कि इंसान की असल ताक़त उसके हौसले, सोच और सही फ़ैसले लेने की सलाहियत में होती है।

इस फ़िल्म को तैयार करने में उनके उस्ताद यूसुफ़ ने भी अहम किरदार अदा किया है। एक छात्र और शिक्षक की यह साझा कोशिश दिखाती है कि तालीमी इदारों में पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक ज़िम्मेदारियों के बारे में जागरूकता पैदा करना भी कितना ज़रूरी है। जब उस्ताद अपने शागिर्दों की सलाहियत को पहचानकर उन्हें सही दिशा देते हैं, तो बच्चे भी समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए आगे आ सकते हैं।

कश्मीर के स्कूलों में फ़िल्म की स्क्रीनिंग के ज़रिये छात्रों तक सीधे पहुंचने की कोशिश की जा रही है। इस तरह का माध्यम नौजवानों को नशे के मसले पर खुलकर सोचने, सवाल करने और अपने साथियों को सही रास्ता चुनने के लिए प्रेरित करने का मौक़ा देता है। कम उम्र में नशे के संपर्क में आने से तालीम, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक ज़िंदगी पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसलिए बच्चों को वक़्त रहते सही जानकारी देना और उन्हें नशे से दूर रहने के लिए प्रोत्साहित करना बेहद अहम है।

कश्मीर घाटी में नशे की समस्या को लेकर अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों की भूमिका भी काफ़ी अहम है। केवल चेतावनी देने से इस समस्या का मुकम्मल हल नहीं निकल सकता। इसके लिए बच्चों के साथ भरोसेमंद बातचीत, खेल-कूद और रचनात्मक गतिविधियों के मौक़े, सही रहनुमाई और ज़रूरत पड़ने पर पेशेवर मदद तक पहुंच सुनिश्चित करना ज़रूरी है। स्कूल इस दिशा में एक प्रभावी मंच बन सकते हैं, जहां छात्र नशे के नुक़सान को समझने के साथ-साथ अपनी परेशानियों पर भी खुलकर बात कर सकें।

ज़ाहिद मंज़ूर की पहल इस बात की मिसाल है कि बदलाव लाने के लिए उम्र का बड़ा होना ज़रूरी नहीं, बल्कि इरादा मज़बूत होना चाहिए। बडगाम के इस छात्र ने अपने उस्ताद के साथ मिलकर एक ऐसा पैग़ाम तैयार किया है, जो कश्मीर के नौजवानों को सोचने और सही रास्ता चुनने की तरफ़ बुलाता है।

नशा-मुक्त कश्मीर की जंग में ज़ाहिद और उनके उस्ताद की यह कोशिश उम्मीद की एक नई किरण है। अगर ऐसे प्रयासों को स्कूलों, अभिभावकों और समाज का साथ मिलता है, तो नौजवानों में जागरूकता बढ़ाने और नशे के ख़िलाफ़ एक मज़बूत सामाजिक माहौल तैयार करने में मदद मिल सकती है। ज़ाहिद की आवाज़ आज अपने स्कूल तक महदूद नहीं, बल्कि उन तमाम बच्चों के लिए एक पैग़ाम है जो अपने और अपने समाज के लिए बेहतर कल का ख़्वाब देखते हैं। 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ