यह पहल नशा मुक्त भारत अभियान के तहत सामने आ रही है, जिसका मकसद समाज में नशीले पदार्थों के खिलाफ जागरूकता पैदा करना और खास तौर पर युवाओं को नशे की लत से बचाना है। बांदीपोरा में इस मुहिम में जम्मू-कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ की 3वीं बटालियन और भारतीय सेना की भागीदारी बताई गई है।
कश्मीर की वादियों में खेल हमेशा से नौजवानों के लिए सिर्फ तफरीह का जरिया नहीं रहे, बल्कि इनसे अनुशासन, मेहनत, टीमवर्क और भाईचारे की भावना भी मजबूत होती है। इसी सोच के साथ बांदीपोरा में आयोजित किए जा रहे खेल मुकाबले युवाओं को मैदान से जोड़ने की कोशिश हैं। फुटबॉल के मैदान में दौड़ता हुआ खिलाड़ी, वॉलीबॉल में टीम के साथ तालमेल बनाता नौजवान या कबड्डी में अपनी ताकत और रणनीति का इस्तेमाल करता खिलाड़ी—ये तमाम गतिविधियां युवाओं को सकारात्मक रास्ते की तरफ ले जाने में मददगार हो सकती हैं।
इलाके में खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने वाली इस पहल का एक अहम पहलू यह भी है कि नौजवानों को अपनी ऊर्जा और वक्त किसी रचनात्मक काम में लगाने का मौका मिल रहा है। नशे की गिरफ्त में आने के बजाय अगर युवा खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाने की कोशिश करें तो इससे उनकी सेहत के साथ-साथ उनके आत्मविश्वास में भी इजाफा हो सकता है।
सुरक्षा बलों की तरफ से आयोजित इन टूर्नामेंटों को स्थानीय स्तर पर युवाओं तक पहुंच बनाने की एक कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है। खेल मुकाबलों के दौरान अलग-अलग गांवों और इलाकों से आने वाले नौजवान एक-दूसरे से मिलते हैं, साथ खेलते हैं और टीम भावना को मजबूत करते हैं। इससे समाज में आपसी राब्ता और भाईचारे को बढ़ावा देने का भी मौका मिलता है।
बांदीपोरा जैसे पहाड़ी और दूरदराज इलाकों में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि इन नौजवानों को अपनी हुनरमंदी दिखाने के लिए लगातार मौके मिलें। अगर स्थानीय स्तर पर खेल प्रतियोगिताओं का सिलसिला जारी रहता है, तो कई उभरते खिलाड़ी जिला, संभाग और राष्ट्रीय स्तर तक अपनी जगह बना सकते हैं।
नशे के खिलाफ जंग में परिवार, स्कूल, समाज और प्रशासन के साथ-साथ युवाओं की खुद की भागीदारी भी बेहद अहम है। खेलों को इसी सामाजिक मुहिम से जोड़कर नौजवानों को यह पैगाम दिया जा रहा है कि उनकी असली ताकत उनकी सेहत, हुनर और मेहनत में है।
बांदीपोरा के खेल मैदानों में हो रही यह गतिविधियां इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि नौजवानों को नशे से दूर रखने के लिए सिर्फ रोकथाम नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर विकल्प देना भी जरूरी है। खेल का मैदान ऐसा ही एक रास्ता है, जहां मुकाबला भी है, अनुशासन भी है और आगे बढ़ने का हौसला भी।


0 टिप्पणियाँ