डॉ. ज़हूर अहमद डार SKUAST-K के रंगरेथ स्थित शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान केंद्र में प्रोफेसर के तौर पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। उन्होंने मक्का की ऐसी उन्नत किस्मों को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है, जो किसानों की पैदावार बढ़ाने और खेती को बदलते मौसम के हालात के मुताबिक मजबूत बनाने में मददगार साबित हो रही हैं। उनके वैज्ञानिक प्रयासों से मक्का की 38 किस्में विकसित हुई हैं, जिनकी खेती देशभर में 80,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर की जा रही है। यह कामयाबी बताती है कि जब शोध, मेहनत और लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर काम किया जाता है, तो उसका फायदा किसी एक इलाके तक महदूद नहीं रहता, बल्कि दूर-दराज़ के किसानों तक पहुँचता है।
डॉ. डार को यह प्रतिष्ठित पुरस्कार हैदराबाद में 2 से 4 नवंबर 2026 तक आयोजित होने वाले पहले अंतरराष्ट्रीय मक्का सम्मेलन में प्रदान किया जाएगा। इस सम्मेलन में मक्का की खेती, अनुसंधान, नई तकनीकों और कृषि क्षेत्र की चुनौतियों पर चर्चा की जाएगी। डॉ. डार का इस सम्मान के लिए चयन कश्मीर में कृषि अनुसंधान की क्षमता और यहाँ के वैज्ञानिकों की मेहनत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाता है।
आज के दौर में खेतीबाड़ी के सामने कई तरह की चुनौतियाँ मौजूद हैं। मौसम में बदलाव, बारिश के अनिश्चित पैटर्न, बढ़ता तापमान और खेती की लागत किसानों के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं। ऐसे हालात में ऐसी फसलों और किस्मों का विकास करना जरूरी है, जो ज्यादा पैदावार देने के साथ-साथ बदलते जलवायु हालात का मुकाबला भी कर सकें। डॉ. ज़हूर अहमद डार का अनुसंधान इन्हीं जरूरतों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रहा है। उनका काम अधिक पैदावार देने वाली, जलवायु के प्रति सहनशील और बेहतर पोषण गुणों वाली मक्का किस्मों के विकास पर केंद्रित है।
मक्का भारत की अहम फसलों में शामिल है। यह किसानों की आमदनी, पशुओं के चारे और खाद्य उद्योग के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में मक्का की बेहतर किस्में विकसित करना केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि किसानों की रोज़ी-रोटी और कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में भी एक अहम कदम है। जब किसी नई किस्म से किसानों को बेहतर पैदावार हासिल करने का अवसर मिलता है, तो उसका असर खेत से लेकर परिवार की आर्थिक स्थिति तक पहुँच सकता है। इसी वजह से कृषि अनुसंधान को ग्रामीण विकास और किसानों की खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है।
कश्मीर के नौजवानों के लिए डॉ. डार की यह कामयाबी एक खास पैगाम रखती है। अक्सर कामयाबी को बड़े शहरों, बड़े संस्थानों या सीमित अवसरों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन डॉ. डार की उपलब्धि बताती है कि अपने इलाके में रहकर भी इंसान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकता है। इसके लिए जरूरी है कि नौजवान तालीम को अपनी ताकत बनाएँ, सवाल पूछने की आदत विकसित करें और अपने हुनर को समाज की जरूरतों से जोड़ें।
कश्मीर की खूबसूरत वादियों में खेतीबाड़ी की एक पुरानी परंपरा रही है। यहाँ के किसानों और बागवानों ने अपनी मेहनत से जमीन को आबाद रखा है। अगर आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान को स्थानीय जरूरतों, किसानों के अनुभव और नई तकनीकों के साथ जोड़ा जाए, तो कृषि क्षेत्र में तरक्की के नए रास्ते खुल सकते हैं। विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की जिम्मेदारी भी यही है कि वे प्रयोगशालाओं में तैयार होने वाले ज्ञान को खेतों तक पहुँचाएँ, ताकि आम किसान उससे वास्तविक फायदा हासिल कर सके।
डॉ. ज़हूर अहमद डार का सम्मान इस बात की याद दिलाता है कि किसी भी समाज की असल ताकत उसके हुनरमंद लोगों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों और मेहनतकश नागरिकों में होती है। उनकी उपलब्धि कश्मीर के युवाओं को यह भरोसा देती है कि मेहनत और लगन के साथ हासिल किया गया इल्म समाज की तस्वीर बदलने में अहम भूमिका निभा सकता है। जरूरत है कि युवा अपने सपनों को सीमित न रखें, बल्कि शिक्षा, विज्ञान, कृषि, तकनीक और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ने का हौसला रखें।
डॉ. डार की यह उपलब्धि कश्मीर के लिए खुशी और फख्र का मौका है। उनकी वैज्ञानिक मेहनत से विकसित मक्का की किस्में देश के हजारों किसानों की खेती का हिस्सा बनी हैं। यह सफलता बताती है कि कश्मीर की प्रतिभा केवल अपनी पहचान बनाने तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश की तरक्की में भी योगदान दे सकती है। यही वह जज़्बा है जो आने वाली पीढ़ियों को मेहनत, जिम्मेदारी और नए विचारों के साथ आगे बढ़ने की राह दिखाता है।


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