डॉ. दरख्शां अंद्राबी ने कहा कि महाराजा हरि सिंह ने उस दौर में एक ऐसा फैसला लिया, जिसका असर जम्मू-कश्मीर के भविष्य पर पड़ा। उनके मुताबिक, जब ब्रिटिश शासन से भारत आजाद हुआ और रियासतों के सामने अपने भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण फैसले लेने का समय आया, तब महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ जाने का निर्णय लिया। डॉ. अंद्राबी ने इस फैसले को उनकी दूरदर्शिता से जोड़ते हुए कहा कि आज जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है और इस स्थिति से क्षेत्र को विभिन्न क्षेत्रों में लाभ मिला है।
महाराजा हरि सिंह की जयंती हर साल 23 सितंबर को मनाई जाती है। इस मौके पर जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में उन्हें श्रद्धांजलि दी गई और उनके शासनकाल तथा सामाजिक-प्रशासनिक योगदान को याद किया गया। जम्मू में आयोजित कार्यक्रमों में भी लोगों ने महाराजा हरि सिंह के प्रति सम्मान प्रकट किया।
डॉ. अंद्राबी ने महाराजा हरि सिंह के प्रशासनिक पक्ष को भी विशेष तौर पर रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि उनके शासन के दौरान शिक्षा, चिकित्सा, नहरों और आम लोगों के लिए विभिन्न सुविधाओं पर ध्यान दिया गया। उनके अनुसार महाराजा के दरबार और प्रशासन में हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदायों के लोग मौजूद थे तथा सभी को समान अधिकार देने की नीति पर जोर दिया जाता था।
उनकी इस टिप्पणी का एक अहम पहलू जम्मू-कश्मीर की बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक विरासत से जुड़ा रहा। कश्मीर की सामाजिक बनावट हमेशा से अलग-अलग मजहबों और समुदायों के मेल-जोल से बनी रही है। ऐसे में महाराजा हरि सिंह के शासनकाल को याद करते हुए समानता और सभी समुदायों की भागीदारी की बात करना आज के दौर में भी सामाजिक सद्भाव के संदर्भ में अहम मानी जा सकती है।
महाराजा हरि सिंह के शासनकाल से जुड़े कई सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों का भी ऐतिहासिक रूप से उल्लेख मिलता है। 23 सितंबर को आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में उनके शासनकाल के दौरान छुआछूत के खिलाफ उठाए गए कदमों और मंदिरों को सभी जातियों के लिए खोलने जैसे सुधारों को भी याद किया गया।
इसी कड़ी में जम्मू-कश्मीर भाजपा के नेताओं ने भी महाराजा हरि सिंह को श्रद्धांजलि दी। श्रीनगर में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. दरख्शां अंद्राबी सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की। इस अवसर पर महाराजा के प्रशासन और जम्मू-कश्मीर के इतिहास में उनके योगदान को याद किया गया।
महाराजा हरि सिंह जम्मू-कश्मीर के इतिहास के उस दौर से जुड़े हुए हैं, जब रियासतों के सामने अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय लेने थे। 1947 का दौर उपमहाद्वीप के लिए बड़े बदलाव का समय था और जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ विलय इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का हिस्सा रहा। ऐसे में उनकी जयंती पर दिए गए डॉ. अंद्राबी के बयान ने एक बार फिर उस ऐतिहासिक निर्णय और उसके बाद जम्मू-कश्मीर की यात्रा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
डॉ. अंद्राबी ने महाराजा हरि सिंह की विरासत को केवल राजनीतिक फैसले तक सीमित न रखते हुए उनके प्रशासन में शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसुविधाओं से जुड़े पहलुओं को भी रेखांकित किया। उनका कहना था कि शासन में विभिन्न समुदायों की भागीदारी और समान अधिकारों की भावना को महत्व दिया गया।
कश्मीर की सरजमीन पर इतिहास की कई परतें आज भी लोगों की यादों और सामाजिक रिश्तों में मौजूद हैं। महाराजा हरि सिंह की जयंती का अवसर भी इसी ऐतिहासिक विरासत को याद करने का एक मौका बनता है। डॉ. अंद्राबी के बयान में भारत के साथ विलय के फैसले को दूरदर्शी बताते हुए जम्मू-कश्मीर के लिए उसके महत्व को रेखांकित किया गया, वहीं उनके शासनकाल की चर्चा में सभी मजहबों और समुदायों के लिए बराबरी के अधिकार की बात सामने आई।
ऐसे में महाराजा हरि सिंह की जयंती केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की बहुरंगी सामाजिक विरासत, साझा इतिहास और विभिन्न समुदायों के बीच बराबरी तथा आपसी भाईचारे की अहमियत को समझने का भी अवसर बनती है। उनके जीवन और शासन से जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक पहलुओं पर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन 23 सितंबर को उनके जन्मदिवस पर जम्मू-कश्मीर में उनका योगदान और 1947 के दौर में लिए गए फैसलों की चर्चा लगातार होती रही है।


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