सरहदी परिवारों तक पहुँची तालीम और हुनर की रोशनी, चिनार महिला सशक्तिकरण केंद्र की पहल


कुपवाड़ा के सरहदी इलाकों में तालीम, हुनर और रोज़गार की नई राहें खोलने की कोशिशों के बीच चिनार महिला सशक्तिकरण केंद्र ने एलओसी से सटे परिवारों के लिए एक ऐसी पहल को आगे बढ़ाया है, जिसमें किताबों की दुनिया और रोज़गार से जुड़े हुनर को एक साथ जोड़ा गया है। भारतीय सेना की ओर से युवाओं और महिलाओं के हुनर को बढ़ावा देने के लिए चलाए जा रहे प्रयासों के तहत 56 राष्ट्रीय राइफल्स और चिनार महिला सशक्तिकरण केंद्र की भूमिका सामने आई है। इस पहल में सरहदी आबादी के लिए एक लाइब्रेरी की सुविधा तथा महिलाओं और युवाओं को आजीविका से जुड़े कौशल की ट्रेनिंग देने पर तवज्जो दी जा रही है। इसका मकसद एलओसी के करीब रहने वाले लोगों, खासकर महिलाओं और नौजवानों को तालीम और हुनर के ऐसे अवसर उपलब्ध कराना है, जो उनके भविष्य के लिए मददगार साबित हो सकें।

सरहदी बस्तियों में रहने वाले परिवारों के लिए किताबों तक पहुंच केवल पढ़ाई का जरिया नहीं, बल्कि नई जानकारी और सोच से जुड़ने का एक अहम माध्यम भी बन सकती है। इसी सोच के तहत एलओसी क्षेत्र के निवासियों के लिए लाइब्रेरी की व्यवस्था की गई है। किताबों से सजा यह पढ़ने का स्थान बच्चों और युवाओं को अध्ययन के लिए माहौल देने के साथ-साथ उन्हें अपने आसपास की दुनिया से आगे देखने का अवसर प्रदान करता है। जहां सरहद के करीब रहने वाले परिवारों की रोज़मर्रा की जिंदगी कई चुनौतियों से जुड़ी होती है, वहीं ऐसी पहल उनके बीच तालीम की अहमियत को और मजबूत करती है। लाइब्रेरी को एक ऐसे स्थान के तौर पर देखा जा रहा है, जहां नौजवान अपने खाली वक्त को किताबों और अध्ययन में लगा सकते हैं तथा अपनी जानकारी को बेहतर बना सकते हैं।

इसी पहल का दूसरा अहम पहलू महिलाओं और युवाओं के लिए हुनरमंदी और आजीविका प्रशिक्षण है। इसमें बुनाई जैसे पारंपरिक हुनर को भी शामिल किया गया है। महिलाओं को ऐसे कौशल से जोड़ना, जिन्हें आगे चलकर आजीविका के साधन में बदला जा सके, सरहदी परिवारों के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। चिनार महिला सशक्तिकरण केंद्र की गतिविधियों में महिलाओं के साथ-साथ युवाओं को भी कौशल विकास से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। बुनाई जैसे हुनर स्थानीय कारीगरी और पारंपरिक हुनर से जुड़े होने के कारण महिलाओं को अपने घर और इलाके से जुड़े रहते हुए काम सीखने तथा अपनी काबिलियत को निखारने का अवसर देते हैं।

इस पहल की खास बात यह है कि यहां तालीम और रोज़गार को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। एक तरफ लाइब्रेरी नौजवानों के लिए किताबों और अध्ययन का माहौल तैयार करती है, तो दूसरी तरफ हुनरमंदी की ट्रेनिंग महिलाओं और युवाओं को व्यावहारिक कौशल से जोड़ती है। यानी एक ही सरहदी इलाके में किताब और करघा दोनों को भविष्य निर्माण के साधन के तौर पर सामने रखा गया है। भारतीय सेना और चिनार महिला सशक्तिकरण केंद्र की यह कोशिश एलओसी के करीब रहने वाले परिवारों के लिए शिक्षा, कौशल और आजीविका के अवसरों को मजबूत करने की दिशा में केंद्रित नजर आती है।

कश्मीर की सरहदी पट्टी में अमन-ओ-अमान के साथ सामाजिक और आर्थिक तरक्की भी स्थानीय परिवारों के लिए अहम जरूरत है। ऐसे में जब सरहदी बस्तियों में लाइब्रेरी और कौशल प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं पहुंचती हैं, तो इसका असर केवल एक गतिविधि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नई पीढ़ी के बीच तालीम और हुनर की अहमियत को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है। 56 राष्ट्रीय राइफल्स और चिनार महिला सशक्तिकरण केंद्र की यह पहल इसी सिलसिले की एक कड़ी है, जिसमें एलओसी के परिवारों तक किताबों की रोशनी और हुनरमंदी के अवसर पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। महिलाओं और युवाओं को हुनर से जोड़कर आत्मनिर्भरता की राह दिखाना तथा नौजवानों के लिए पढ़ने का स्थान उपलब्ध कराना सरहदी समाज में सकारात्मक बदलाव की बुनियाद को मजबूत करने वाला प्रयास है।

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