जम्मू-कश्मीर में 64.5 किमी के सात रोपवे कॉरिडोर की योजना


जम्मू-कश्मीर में पहाड़ी और दूरदराज़ इलाक़ों तक बेहतर पहुंच बनाने के लिए रोपवे नेटवर्क को विस्तार देने की तैयारी तेज़ हो गई है। नेशनल हाईवेज लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट लिमिटेड ने केंद्र शासित प्रदेश में सात अहम रोपवे कॉरिडोर के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। प्रस्तावित सात कॉरिडोर की कुल लंबाई लगभग 64.5 किलोमीटर रखी गई है। इन परियोजनाओं का मक़सद प्रमुख पर्यटन और ज़ियारत स्थलों तक पहुंच को आसान बनाना, पहाड़ी इलाक़ों में परिवहन के विकल्प बढ़ाना और जम्मू-कश्मीर के पर्यटन सेक्टर को नई ताक़त देना है।

प्रस्तावित नेटवर्क में कश्मीर के कई अहम पर्यटन और धार्मिक स्थल शामिल हैं। इनमें सोनमर्ग-थाजीवास ग्लेशियर, बालटाल-अमरनाथ गुफा, नासरी टनल-सनासर, भद्रवाह-सेओजधार, दूधपथरी तथा पहलगाम-अमरनाथ बेस प्वाइंट से चंदनवाड़ी और चंदनवाड़ी से अमरनाथ गुफा तक के रोपवे शामिल हैं। इस नेटवर्क में सबसे अहम हिस्सेदारी अमरनाथ से जुड़े तीन प्रस्तावित मार्गों की है, जिनकी कुल लंबाई करीब 49 किलोमीटर बैठती है।

जानकारी के मुताबिक सोनमर्ग से थाजीवास ग्लेशियर तक प्रस्तावित रोपवे की लंबाई लगभग 2.13 किलोमीटर होगी, जबकि बालटाल से अमरनाथ गुफा तक करीब 11.6 किलोमीटर का रोपवे प्रस्तावित है। नासरी टनल-सनासर कॉरिडोर की लंबाई लगभग 2.97 किलोमीटर और भद्रवाह-सेओजधार रोपवे करीब 8.8 किलोमीटर का होगा। दूधपथरी क्षेत्र में परिहास से डिशखल तक लगभग 2 किलोमीटर का रोपवे प्रस्तावित है। इसके अलावा पहलगाम के अमरनाथ बेस प्वाइंट से चंदनवाड़ी तक करीब 14 किलोमीटर और चंदनवाड़ी से अमरनाथ गुफा तक लगभग 23 किलोमीटर का रोपवे प्रस्तावित किया गया है।

इन परियोजनाओं की डीपीआर सिर्फ़ रास्ते और लंबाई तय करने तक महदूद नहीं होगी। संबंधित अध्ययन में तकनीकी, आर्थिक, वित्तीय, पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं का जायज़ा लिया जाएगा। यात्रियों की संभावित तादाद, अलग-अलग मौसम में आवाजाही, व्यस्त दिनों में ट्रैफिक, मौजूदा सड़क परिवहन और आने वाले वर्षों में यात्रियों की मांग को भी अध्ययन का हिस्सा बनाया जाएगा। इसके अलावा संभावित किराया और लोगों की भुगतान क्षमता का भी आकलन किया जाएगा।

पहाड़ी इलाक़ों में ऐसे प्रोजेक्टों के लिए ज़मीन, पर्यावरण और सुरक्षा से जुड़े पहलू भी बेहद अहम हैं। डीपीआर के दौरान टोपोग्राफिकल, जियोटेक्निकल और जियोडेटिक सर्वे किए जाएंगे। जहां ज़रूरत होगी, वहां हिमस्खलन से जुड़े सर्वे भी किए जाएंगे। संभावित रूट के वैकल्पिक अलाइनमेंट की भी जांच होगी ताकि पर्यावरणीय असर, वन्यजीव, ज़मीन की ज़रूरत, मौजूदा ढांचे और निर्माण लागत जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए बेहतर रास्ता चुना जा सके।

कश्मीर के लिए इन रोपवे परियोजनाओं की अहमियत सिर्फ़ सफ़र को आसान बनाने तक सीमित नहीं है। अगर डीपीआर के बाद परियोजनाएं निर्माण के मरहले तक पहुंचती हैं, तो इससे दूरदराज़ पर्यटन स्थलों तक सैलानियों की पहुंच बेहतर हो सकती है। ख़ास तौर पर थाजीवास, दूधपथरी, सनासर और अमरनाथ जैसे इलाक़ों में रोपवे पर्यटकों और ज़ायरीन के लिए एक नया और सुविधाजनक विकल्प बन सकते हैं।

इससे स्थानीय मआशियत को भी फ़ायदा पहुंचने की उम्मीद है। रोपवे परियोजनाओं के निर्माण और संचालन से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर रोज़गार के नए मौक़े पैदा हो सकते हैं। स्थानीय टैक्सी संचालकों, होटल और होम-स्टे कारोबार, दुकानदारों, गाइडों, रेस्तरां और हस्तशिल्प से जुड़े लोगों को बढ़ती पर्यटक आवाजाही का लाभ मिल सकता है। इसके साथ ही नए पर्यटन सर्किट विकसित होने से जम्मू-कश्मीर के कम मशहूर इलाक़ों को भी राष्ट्रीय पर्यटन नक्शे पर जगह मिलने की उम्मीद है।

अमरनाथ यात्रा के संदर्भ में भी प्रस्तावित रोपवे परियोजनाएं ख़ास अहमियत रखती हैं। बालटाल और पहलगाम-चंदनवाड़ी से जुड़े मार्ग कठिन पहाड़ी भूगोल वाले इलाक़ों से होकर गुजरते हैं। ऐसे में रोपवे का विकल्प भविष्य में यात्रा प्रबंधन को आसान बनाने और यात्रियों की आवाजाही को बेहतर ढंग से व्यवस्थित करने में मददगार साबित हो सकता है। हालांकि इन परियोजनाओं की वास्तविक व्यवहार्यता डीपीआर, सर्वेक्षणों और आवश्यक मंज़ूरियों के बाद ही साफ़ होगी।

इन सात परियोजनाओं को परवत्‍माला परियोजना के तहत आगे बढ़ाने की कवायद शुरू की है। फिलहाल मामला डीपीआर तैयार करने के मरहले में है और प्रस्तावित लंबाइयों को विस्तृत सर्वे के बाद अंतिम रूप दिया जाएगा।

अगर ये परियोजनाएं तमाम तकनीकी, पर्यावरणीय और वित्तीय जांच के बाद ज़मीन पर उतरती हैं, तो जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाक़ों में कनेक्टिविटी का नया बाब खुल सकता है। रोपवे सिर्फ़ सफ़र का एक नया ज़रिया नहीं होंगे, बल्कि पर्यटन, ज़ियारत, रोज़गार और स्थानीय तरक़्क़ी को एक साथ आगे बढ़ाने का ज़रिया भी बन सकते हैं। कश्मीर की पहाड़ियों में आसमान के रास्ते बनने वाला यह नेटवर्क आने वाले वक़्त में सैर-ओ-सियाहत और स्थानीय मआशियत के लिए नई उम्मीद बन सकता है।

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