श्रीनगर के शब्बीर हुसैन खान ने 46 साल में 195 पिंट रक्तदान कर पेश की मिसाल


श्रीनगर के रहने वाले 60 वर्षीय शब्बीर हुसैन खान ने इंसानी खिदमत और समाजी जिम्मेदारी की ऐसी मिसाल कायम की है, जो घाटी के नौजवानों के लिए भी एक पैगाम बन सकती है। शब्बीर हुसैन खान ने पिछले 46 वर्षों में 195 पिंट रक्तदान किया है। साल 1980 में शुरू हुआ उनका यह सफर आज भी जारी है और इस दौरान उन्होंने न सिर्फ खुद बार-बार रक्तदान किया, बल्कि जरूरतमंद मरीजों की मदद के लिए 1,500 से ज्यादा ब्लड डोनेशन कैंप आयोजित कराने में भी अहम किरदार अदा किया।

शब्बीर हुसैन खान की यह कोशिश महज रक्तदान तक महदूद नहीं रही। उन्होंने अलग-अलग मौकों पर लोगों को रक्तदान की अहमियत समझाने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस नेक काम से जोड़ने की कोशिश की। उनके मुताबिक, एक यूनिट खून किसी जरूरतमंद मरीज के लिए जिंदगी की उम्मीद बन सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने दशकों तक इस समाजी खिदमत को अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखा।

उनकी कोशिशों का सिलसिला उस वक्त भी नहीं रुका जब पूरी दुनिया COVID-19 महामारी के मुश्किल दौर से गुजर रही थी। महामारी के दौरान जहां आम जिंदगी बुरी तरह मुतासिर हुई थी और अस्पतालों के सामने कई तरह की चुनौतियां थीं, वहीं शब्बीर हुसैन खान ने रक्तदान कैंपों के आयोजन में अपना योगदान जारी रखा। इस दौरान भी जरूरतमंद मरीजों तक खून पहुंचाने और रक्तदाताओं को लामबंद करने की कोशिश की गई।

शब्बीर हुसैन खान की कहानी इस लिहाज से भी अहम है कि यह घाटी में मौजूद उस समाजी रूह को सामने लाती है, जिसमें लोग मुश्किल वक्त में एक-दूसरे के काम आने को अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। रक्तदान किसी मजहब, बिरादरी या इलाके की सीमा में बंधा हुआ काम नहीं है। जरूरत के वक्त दिया गया खून किसी भी मरीज की जिंदगी बचाने में मददगार हो सकता है।

डाउनटाउन श्रीनगर से निकलकर पिछले चार दशकों से ज्यादा समय से जारी उनकी यह खिदमत स्थानीय स्तर पर खिदमत-ए-खल्क की एक मिसाल के तौर पर देखी जा सकती है। 195 पिंट रक्तदान का आंकड़ा अपने आप में उनके लंबे सफर को बयान करता है, जबकि 1,500 से ज्यादा ब्लड कैंपों के आयोजन में भूमिका यह दिखाती है कि उन्होंने व्यक्तिगत रक्तदान से आगे बढ़कर समाज को भी इस नेक काम से जोड़ने की कोशिश की।

आज जब नौजवान पीढ़ी के सामने अपने वक्त और काबिलियत को समाजी भलाई के काम में लगाने के कई रास्ते मौजूद हैं, शब्बीर हुसैन खान का सफर एक सकारात्मक पैगाम देता है। उनकी जिंदगी का यह पहलू बताता है कि किसी इंसान की छोटी-सी कोशिश भी लंबे अरसे में बड़े समाजी असर में बदल सकती है। खासकर रक्तदान जैसे काम में जहां एक डोनर का फैसला सीधे किसी मरीज और उसके खानदान के लिए उम्मीद पैदा कर सकता है।

घाटी में ब्लड डोनेशन को लेकर जागरूकता बढ़ाने में ऐसे लोगों की भूमिका अहम मानी जाती है। नियमित रक्तदान से लोगों में यह एहसास पैदा होता है कि समाजी जिम्मेदारी सिर्फ सरकारी संस्थानों या अस्पतालों तक सीमित नहीं, बल्कि आम नागरिक भी इसमें अपना हिस्सा अदा कर सकते हैं।

शब्बीर हुसैन खान का 46 साल लंबा सफर इसी नागरिक जिम्मेदारी और इंसानी हमदर्दी की तस्वीर पेश करता है। 1980 में शुरू हुआ रक्तदान का यह सिलसिला आज 195 पिंट तक पहुंच चुका है, जबकि उनके सहयोग से आयोजित 1,500 से ज्यादा ब्लड कैंप समाज में उनकी लगातार सक्रियता को जाहिर करते हैं।

उनकी कहानी श्रीनगर और पूरी कश्मीर घाटी के लिए एक ऐसा सकारात्मक पैगाम है जिसमें इंसानियत, आपसी मदद और समाजी जिम्मेदारी को अहमियत दी गई है। ऐसे प्रयास न सिर्फ जरूरतमंद मरीजों के लिए सहारा बनते हैं, बल्कि नौजवानों को भी यह प्रेरणा देते हैं कि वे अपने आसपास के समाज की बेहतरी और अमनभरी जिंदगी के लिए अपना किरदार अदा कर सकते हैं।

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