कश्मीर में अमन और स्थिरता की नई राह: नागरिक-सैन्य सहयोग से सुरक्षा, विकास और भरोसे को मिल रही मजबूती


जम्मू और कश्मीर हिंदुस्तान के सबसे पेचीदा सुरक्षा माहौल वाले इलाक़ों में से एक है। यह इलाक़ा सरहद पार आतंकवाद, प्रॉक्सी जंग, कट्टरपंथ, मुश्किल पहाड़ी इलाक़ों, कुदरती आफ़तों और सामाजिक व मआशी चुनौतियों से प्रभावित रहा है। पिछले तीन दशकों के तजुर्बे से यह बात सामने आई है कि मुकम्मल और पायदार अमन सिर्फ़ फ़ौजी कार्रवाई से हासिल नहीं किया जा सकता। सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ अवाम का भरोसा, जवाबदेह हुकूमत, तरक़्क़ी और स्थानीय लोगों के साथ सार्थक ताल्लुक़ भी ज़रूरी है। इसी सिलसिले में नागरिक-सैन्य सहयोग (Civil-Military Cooperation) एक अहम ताक़त के तौर पर सामने आया है, जो फ़ौज, सिविल इंतज़ामिया, पुलिस, सरकारी इदारों और स्थानीय आबादी को अमन, सुरक्षा, स्थिरता और तरक़्क़ी के लिए मिलकर काम करने का मौक़ा देता है।

आज के दौर का संघर्ष सिर्फ़ पारंपरिक जंग के मैदान तक महदूद नहीं रहा। इसलिए कामयाबी का पैमाना सिर्फ़ फ़ौजी कार्रवाई के नतीजों से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होता है कि क्या हम पायदार अमन के लिए बेहतर हालात पैदा कर पा रहे हैं या नहीं। उग्रवाद-रोधी अभियानों में फ़ौजी असरदारियत के साथ सब्र, एहतियात और इंसानी रवैये की भी ज़रूरत होती है। साथ ही नौजवानों, ख़वातीन और सरहदी इलाक़ों में रहने वाले लोगों के लिए तरक़्क़ी और रोज़गार के मौक़े पैदा करना भी उतना ही अहम है।

नागरिक-सैन्य सहयोग की बुनियाद सुरक्षा बलों, सिविल अफ़सरों, विकास से जुड़े इदारों और स्थानीय लोगों के बीच बेहतर तालमेल पर क़ायम होती है। इस सहयोग की असल बुनियाद आपसी भरोसा, इज़्ज़त, सिविल इंतज़ामिया की अहमियत, अवामी शिरकत, इंसानी मदद, शफ़्फ़ाफ़ियत और पायदार तरक़्क़ी है। जब इन उसूलों के मुताबिक़ काम किया जाता है तो सुरक्षा और तरक़्क़ी एक-दूसरे को मज़बूत बनाते हैं। इससे ऐसा माहौल बनता है जिसमें लोग खुद को महफ़ूज़ महसूस करते हैं और सरकारी इदारे भी ज़्यादा जवाबदेह और असरदार बनते हैं।

इस पूरे नज़रिये की बुनियाद भरोसा है। गाँवों में मुलाक़ातें, अवामी बैठकों, जनसंपर्क कार्यक्रमों, मेडिकल कैंपों, तालीमी गतिविधियों और इंसानी मदद के ज़रिए फ़ौज और आम लोगों के बीच मौजूद दूरी को कम किया जा सकता है। जब स्थानीय लोग सुरक्षा कर्मियों को सिर्फ़ हथियारबंद ताक़त के तौर पर नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार मददगार और साझेदार के तौर पर देखते हैं, तो बातचीत बेहतर होती है और ग़लतफ़हमियाँ कम होती हैं। यही ताल्लुक़ स्थानीय स्तर पर सुरक्षा से जुड़ी अहम जानकारी हासिल करने में भी मददगार हो सकता है, क्योंकि लोग संदिग्ध गतिविधियों, सुरक्षा से जुड़े ख़तरों या चरमपंथी नेटवर्क की कोशिशों के बारे में समय रहते इत्तिला दे सकते हैं।

तरक़्क़ी भी नागरिक-सैन्य सहयोग का एक अहम पहलू है। दूर-दराज़ और पहाड़ी इलाक़ों में सीमित सड़क संपर्क, सख़्त मौसम और मुश्किल भौगोलिक हालात की वजह से स्कूल, अस्पताल, सड़क, संचार और रोज़गार जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच मुश्किल हो सकती है। फ़ौज की तरफ़ से तालीमी मदद, मेडिकल कैंप, हुनरमंदी की ट्रेनिंग, सामुदायिक बुनियादी ढाँचे और आपातकालीन राहत जैसी पहलें की जाती रही हैं। इनका मक़सद स्थानीय आबादी और सिविल इदारों को मज़बूत बनाना होना चाहिए, न कि लोगों में फ़ौजी मदद पर हमेशा के लिए निर्भरता पैदा करना।

नौजवानों की शिरकत इस सिलसिले में बेहद अहम है। बेरोज़गारी, मौक़ों की कमी और सोशल मीडिया पर फैलने वाली ग़लत मालूमात नौजवानों को चरमपंथी सोच की तरफ़ धकेल सकती हैं। तालीमी दौरे, करियर काउंसलिंग, खेल, वोकेशनल ट्रेनिंग और हुनरमंदी के कार्यक्रम नौजवानों के सामने बेहतर और सकारात्मक रास्ते खोल सकते हैं। इससे उनकी सोच और आकांक्षाओं का दायरा भी बढ़ता है।

इसी तरह ख़वातीन को सशक्त बनाना भी समाज की मज़बूती के लिए ज़रूरी है। सिलाई और कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर, स्वयं सहायता समूह, कारोबार और उद्यमिता से जुड़े कार्यक्रम तथा वित्तीय जानकारी जैसी पहलें ख़वातीन को अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद कर सकती हैं। इससे घरों की आमदनी बेहतर होने के साथ-साथ पूरे समाज की मज़बूती और आत्मनिर्भरता में भी इज़ाफ़ा होता है।

इंसानी मदद नागरिक-सैन्य सहयोग का एक और अहम पहलू है। कश्मीर की भौगोलिक स्थिति की वजह से यह इलाक़ा सैलाब, बर्फ़ीले तूफ़ान, हिमस्खलन, ज़मीन खिसकने, ज़लज़लों और भारी बर्फ़बारी जैसी कुदरती आफ़तों के लिए संवेदनशील है। ऐसे मुश्किल वक़्त में भारतीय फ़ौज राहत और बचाव के काम में तेज़ी से मदद कर सकती है। इसमें लोगों को सुरक्षित जगह पहुँचाना, रेस्क्यू, मेडिकल मदद, राहत सामग्री पहुँचाना, रास्तों से बर्फ़ और मलबा हटाना तथा ज़रूरी संपर्क व्यवस्था बहाल करना शामिल है। आने वाले वक़्त में आपदा से निपटने की तैयारी को सिविल डिज़ास्टर मैनेजमेंट सिस्टम के साथ और बेहतर तरीके से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि स्थानीय इदारे भी ऐसे हालात में ख़ुद असरदार कार्रवाई कर सकें।

सद्भावना जम्मू और कश्मीर में फ़ौज की अवाम-केंद्रित गतिविधियों की एक अहम मिसाल रही है। इसके तहत तालीम, सेहत, नौजवानों की तरक़्क़ी, ख़वातीन की बेहतरी, सामुदायिक बुनियादी ढाँचे और कल्याणकारी कामों को मदद दी गई है। हालांकि, इसका दीर्घकालीन मक़सद यह होना चाहिए कि धीरे-धीरे विकास की ज़िम्मेदारी सिविल इदारों के हाथों में मज़बूत हो। फ़ौजी मदद वहाँ दी जाए जहाँ उसकी ख़ास सलाहियत, लॉजिस्टिक पहुँच या आपातकालीन क्षमता वास्तव में कोई अतिरिक्त फ़ायदा दे सकती हो।

नागरिक-सैन्य सहयोग के सामने कई मुश्किलात भी हैं। दुश्मनाना प्रोपेगेंडा और ग़लत मालूमात लोगों के भरोसे को कमज़ोर कर सकती हैं और सुरक्षा से जुड़ी पहलों के बारे में गलत तस्वीर पेश कर सकती हैं। आतंकवादी हिंसा और घुसपैठ की कोशिशें तरक़्क़ी के कामों को रोक सकती हैं और सरहदी इलाक़ों में बेचैनी पैदा कर सकती हैं। पहाड़ी इलाक़े और सख़्त सर्दियाँ बुनियादी ढाँचे और सरकारी सेवाओं की पहुँच को मुश्किल बनाती हैं। दूसरी तरफ़ लोगों की मआशी उम्मीदें भी तेज़ी से बढ़ रही हैं, जबकि रोज़गार के मौक़े उतनी तेज़ी से पैदा नहीं हो पा रहे हैं। कई सरकारी और सुरक्षा इदारों के बीच तालमेल भी एक चुनौती हो सकता है। इन मुश्किलात से निपटने के लिए बेहतर रणनीतिक संचार, मज़बूत संस्थागत तालमेल, भरोसेमंद अवामी जानकारी और स्थानीय सलाहियतों में लगातार निवेश की ज़रूरत है।

कश्मीर में नागरिक-सैन्य सहयोग का आने वाला दौर मज़बूत सिविल-फ़ौजी साझेदारी, नौजवानों के रोज़गार, कारोबार और उद्यमिता, डिजिटल तालीम, ख़वातीन की अगुवाई में तरक़्क़ी, बेहतर सरहदी बुनियादी ढाँचे और मज़बूत आपदा प्रबंधन पर केंद्रित होना चाहिए। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीकें भी, जहाँ मुनासिब हों, आपदा राहत और इमरजेंसी मैनेजमेंट में मददगार साबित हो सकती हैं।

दुनिया के दूसरे संघर्ष प्रभावित इलाक़ों का तजुर्बा भी यही बताता है कि पायदार अमन के लिए सिर्फ़ सुरक्षा काफ़ी नहीं होती। इसके लिए अच्छी हुकूमत, मआशी मौक़े, अवामी शिरकत, इंसानी हुक़ूक़ का एहतराम और लोगों का भरोसा भी ज़रूरी है। यही संतुलन लंबे अरसे की स्थिरता की बुनियाद बनता है। हथियारबंद ख़तरों का मुक़ाबला करने के लिए फ़ौजी ताक़त ज़रूरी है, लेकिन उसकी असरदारियत उस वक़्त और बढ़ जाती है जब अवाम को अपने इदारों पर भरोसा हो और उन्हें अपने बच्चों और आने वाली नस्लों के लिए बेहतर मुस्तक़बिल नज़र आए।

नागरिक-सैन्य सहयोग महज़ एक सहायक ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक नज़रिया है, जो सुरक्षा को स्थिरता और तरक़्क़ी के साथ जोड़ता है। सामुदायिक संपर्क, इंसानी मदद, तालीम, सेहत, हुनरमंदी, ख़वातीन की बेहतरी और बुनियादी ढाँचे के ज़रिए भारतीय फ़ौज सिविल इदारों का साथ दे सकती है और दूर-दराज़ तथा मुश्किल हालात वाले इलाक़ों में लोगों की मज़बूती और आत्मनिर्भरता बढ़ाने में मदद कर सकती है।

जैसे-जैसे हालात बेहतर होते जाएँ, ज़ोर धीरे-धीरे सिविल-लेड विकास पर बढ़ना चाहिए और सुरक्षा बल ज़रूरत के वक़्त मददगार की भूमिका निभाते रहें। आख़िरकार कश्मीर में पायदार अमन का रास्ता महफ़ूज़ समाज, जवाबदेह हुकूमत, बेहतर मआशी मौक़ों और पूरे इलाक़े में अवाम के भरोसे से होकर गुज़रता है। नागरिक-सैन्य सहयोग इन तमाम पहलुओं को एक साथ जोड़कर कश्मीर में लंबे अरसे के अमन, स्थिरता और समावेशी तरक़्क़ी की राह हमवार करने में अहम किरदार अदा कर सकता है।

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