जम्मू-कश्मीर के सोपोर से सामने आई एक तस्वीर आतंकवाद के खिलाफ बदलती सामाजिक सोच और कश्मीर में अमन की बढ़ती चाहत का अहम संदेश दे रही है। लश्कर-ए-तैयबा (LeT) से जुड़े आतंकी आबिद रहमान शेख के माता-पिता ने अपने घर पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया है। परिवार की ओर से सार्वजनिक रूप से साफ किया गया कि उनका आतंकवादियों से कोई संबंध नहीं है और वे अपने देश पर गर्व करते हैं।
आबिद रहमान शेख का नाम आतंकवादी गतिविधियों से जोड़े जाने के बावजूद उसके परिवार का यह रुख इस बात को सामने लाता है कि आतंकवाद का रास्ता अपनाने वाले व्यक्ति और उसके परिवार की सोच को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। मां का सार्वजनिक बयान खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने आतंकवाद से दूरी बनाते हुए देश के प्रति अपनी निष्ठा और गर्व को खुलकर जाहिर किया है।
कश्मीर में लंबे समय तक आतंकवाद और अलगाववाद की विचारधारा ने आम परिवारों को डर, असुरक्षा और सामाजिक दबाव के माहौल में रखा। कई परिवारों ने आतंकवाद की वजह से अपने बच्चों, रोजगार और सामान्य जिंदगी को प्रभावित होते देखा। ऐसे में किसी आतंकी के परिवार द्वारा ही आतंकवाद से दूरी और तिरंगे के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना एक मजबूत सामाजिक संदेश के रूप में देखा जा सकता है।
इस घटनाक्रम का एक बड़ा पहलू पाकिस्तान प्रायोजित कट्टरपंथ के नैरेटिव पर भी सवाल खड़ा करता है। सीमा पार से युवाओं को हिंसा और बंदूक के रास्ते पर धकेलने की कोशिशों के बावजूद जब स्थानीय परिवार स्वयं आतंकवाद को अस्वीकार करते हैं, तो यह बताता है कि हिंसा का रास्ता आम कश्मीरी समाज की स्थायी पसंद नहीं है। इसके विपरीत, शिक्षा, रोजगार, विकास, खेल और शांतिपूर्ण भविष्य को लेकर लोगों की आकांक्षाएं लगातार मजबूत हुई हैं।
सोपोर में तिरंगा फहराने वाला यह परिवार इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उसका संदेश किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि आतंकवाद से प्रभावित एक परिवार के घर से आया है। मां का यह कहना कि परिवार का आतंकवादियों से कोई संबंध नहीं है, समाज में जिम्मेदारी और स्पष्टता की भावना को दर्शाता है।
यह घटना इस व्यापक बदलाव की ओर भी इशारा करती है कि कश्मीर की नई पीढ़ी और स्थानीय समाज हिंसा की जगह अमन, तरक्की और राष्ट्रीय मुख्यधारा के साथ जुड़ाव को प्राथमिकता दे रहे हैं। तिरंगे का फहराया जाना इसी बदलती मानसिकता का एक प्रतीक बनकर सामने आया है।
हालांकि किसी एक परिवार की घटना को पूरे क्षेत्र की सामूहिक राय का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन यह उदाहरण निश्चित रूप से दिखाता है कि आतंकवाद के खिलाफ सामाजिक अस्वीकृति की आवाज उन घरों से भी उठ सकती है, जो स्वयं आतंकवाद की त्रासदी से प्रभावित रहे हैं। यही बदलाव पाकिस्तान प्रायोजित कट्टरपंथ के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

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