संयुक्त राष्ट्र मंच से कश्मीर पर पाकिस्तान का आरोप, अपने ही रिकॉर्ड पर उठे सवाल

 


संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में "राइट ऑफ रिप्लाई" के दौरान पाकिस्तान की काउंसलर साइमा सलीम ने भारत पर कश्मीर, अल्पसंख्यकों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई आरोप लगाए। अपने वक्तव्य में उन्होंने भारत पर अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन, जम्मू-कश्मीर में कथित दमन और राज्य प्रायोजित आतंकवाद जैसे आरोप लगाए। इसके साथ ही पाकिस्तान के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने इस बयान को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया मंचों पर भी साझा किया।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों का उपयोग कश्मीर मुद्दे को उठाने के लिए करता रहा है, जबकि उसके अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) और बलोचिस्तान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक अधिकारों और मानवाधिकारों को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में चिंताएं व्यक्त की गई हैं।

सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान एक ओर अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों की बात करता है, वहीं दूसरी ओर उस पर अपनी भूमि से संचालित आतंकवादी संगठनों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई न करने के आरोप भी लगते रहे हैं। भारत लगातार यह कहता आया है कि सीमा पार से आतंकवाद को समर्थन देना क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की कूटनीतिक रणनीति अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ आरोप लगाने पर केंद्रित रहती है, जबकि उसके घरेलू हालात और आंतरिक चुनौतियां समान रूप से अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी रहती हैं। उनका कहना है कि यदि कोई देश अंतरराष्ट्रीय मंच पर मानवाधिकारों और कानून के शासन की बात करता है, तो उसके अपने रिकॉर्ड की भी समान रूप से समीक्षा होना स्वाभाविक है।

जानकारों का यह भी कहना है कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर और बलोचिस्तान में राजनीतिक असहमति, विरोध प्रदर्शनों और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर केवल एकतरफा आरोप लगाने के बजाय सभी पक्षों के तथ्यों और रिकॉर्ड पर समान रूप से विचार किया जाना आवश्यक है।

भारत का रुख लगातार यही रहा है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न अंग है और सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले ढांचे को समाप्त किए बिना क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती। भारत यह भी कहता है कि आतंकवाद और संवाद साथ-साथ नहीं चल सकते तथा किसी भी विवाद का समाधान हिंसा और आतंकवाद से नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण और वैध माध्यमों से होना चाहिए।

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