लश्कर-ए-तैयबा नेताओं की पूर्व पीओजेके प्रधानमंत्री से मुलाक़ात, पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क पर फिर उठे सवाल


इस्लामाबाद/मुज़फ़्फराबाद: पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) से जुड़े वरिष्ठ नेताओं की पूर्व प्रधानमंत्री सरदार तनवीर इलियास से मुलाक़ात ने एक बार फिर पाकिस्तान में आतंकी नेटवर्क और राजनीतिक हलकों के बीच कथित संबंधों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मुलाक़ात 17 जुलाई 2026 को सरदार तनवीर इलियास के काफ़िले पर हुए हमले के बाद की गई, जिसमें उनके पूर्व एसएसजी कमांडो और निजी सुरक्षा अधिकारी मोहम्मद आसिफ की मौत हो गई थी।

मिली जानकारी के मुताबिक लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तान मरकज़ी मुस्लिम लीग (PMML) से जुड़े चौधरी शफ़ीक़ उर रहमान वर्राइच, यासिर आरिफ़ बट और इनाम उर रहमान कम्बोह पूर्व प्रधानमंत्री सरदार तनवीर इलियास के आवास पहुंचे और संवेदना व्यक्त की। इस मुलाक़ात की तस्वीरें और विवरण सामने आने के बाद पाकिस्तान की आतंकवाद विरोधी नीति पर फिर बहस तेज़ हो गई है।

विश्लेषकों का कहना है कि यदि किसी प्रतिबंधित आतंकी संगठन से जुड़े राजनीतिक चेहरे खुले तौर पर पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर के एक पूर्व प्रधानमंत्री से मुलाक़ात करते हैं, तो यह उन दावों पर प्रश्नचिह्न लगाता है जिनमें पाकिस्तान लंबे समय से अपने यहां सक्रिय आतंकी ढांचे को समाप्त करने की बात करता रहा है।

सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान का आतंकी ढांचा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि समय के साथ उसने अपना स्वरूप बदल लिया है। कई संगठनों ने नए नाम, नए मंच और नए राजनीतिक चेहरे अपनाकर अपनी मौजूदगी बनाए रखी है। यही कारण है कि आतंकवादी नेटवर्क प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय दिखाई देते हैं और उन्हें सामाजिक या राजनीतिक स्वीकार्यता मिलने के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, जब किसी प्रतिबंधित संगठन से जुड़े व्यक्तियों की सार्वजनिक स्तर पर राजनीतिक नेताओं के साथ मुलाक़ातें होती हैं, तो इससे यह संदेश जाता है कि ऐसे तत्व अब भी प्रभाव और संरक्षण प्राप्त किए हुए हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पाकिस्तान के उन दावों की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है, जिनमें वह आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का दावा करता है।

जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान का आतंकी ढांचा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता, बल्कि समय और परिस्थितियों के अनुसार अपना चेहरा बदल लेता है। कभी ये संगठन नए नामों से सामने आते हैं, कभी राजनीतिक या सामाजिक मंचों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और कभी नए संगठनों के रूप में सक्रिय दिखाई देते हैं। इससे उनके मूल नेटवर्क और प्रभाव को समाप्त करना कठिन हो जाता है।

यह घटनाक्रम एक बार फिर इस बहस को हवा देता है कि क्या पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों में प्रतिबंधित आतंकी संगठनों और कुछ राजनीतिक वर्गों के बीच दूरी वास्तव में उतनी है, जितनी आधिकारिक तौर पर दिखाई जाती है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे घटनाक्रम पाकिस्तान के आतंकी ढांचे और उससे जुड़े नेटवर्क पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं तथा यह संकेत देते हैं कि इन नेटवर्कों की संरचना समय के साथ बदलती रही है, लेकिन उनके अस्तित्व को लेकर चिंताएँ अब भी बनी हुई हैं।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ