बारामूला से उठा अमन, भाईचारे और नशा-मुक्त कश्मीर का पैग़ाम


जम्मू-कश्मीर के बारामूला ज़िले में आयोजित "इंटरफेथ डायलॉग फ़ॉर हार्मनी" कार्यक्रम ने एक बार फिर यह पैग़ाम दिया कि वादी की असली पहचान अमन, इंसानियत, भाईचारे और साझा तहज़ीब है। सेव यूथ सेव फ्यूचर फ़ाउंडेशन की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने शिरकत की और समाज में आपसी सौहार्द, नशा-मुक्ति तथा युवाओं की सकारात्मक भागीदारी पर ज़ोर दिया।

अपने ख़िताब में उप-राज्यपाल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की रूह हमेशा से सूफ़ियों, ऋषियों और संतों की शिक्षाओं से रोशन रही है। यही विरासत इस धरती को मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे का पैग़ाम देती है। उन्होंने कहा कि मज़हब चाहे कोई भी हो, उसका मक़सद इंसान को बेहतर इंसान बनाना और समाज में शांति, करुणा तथा एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना पैदा करना है।

मनोज सिन्हा ने सेव यूथ सेव फ्यूचर फ़ाउंडेशन द्वारा चलाए जा रहे नशा-मुक्त जम्मू-कश्मीर अभियान की सराहना करते हुए कहा कि यह केवल एक सामाजिक पहल नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के बेहतर भविष्य की बुनियाद है। उन्होंने कहा कि नशे जैसी बुराई से युवाओं को बचाना पूरे समाज की साझा ज़िम्मेदारी है और इसमें परिवार, शिक्षण संस्थान, धार्मिक संगठन, सामाजिक संस्थाएँ तथा प्रशासन सभी की बराबर की भूमिका है।

उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपनी ऊर्जा को शिक्षा, खेल, हुनर, नवाचार और समाज सेवा जैसे रचनात्मक क्षेत्रों में लगाएँ। उनका कहना था कि जम्मू-कश्मीर का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में है और जब युवा सही दिशा में आगे बढ़ेंगे तो पूरा समाज तरक़्क़ी की राह पर चलेगा। उन्होंने कहा कि सरकार भी युवाओं को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने और उन्हें नशे जैसी सामाजिक बुराइयों से दूर रखने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।

कार्यक्रम में विभिन्न धर्मों के धार्मिक विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, युवाओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया। सभी वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अलग-अलग आस्थाओं के बावजूद इंसानियत, मोहब्बत, भाईचारा और सामाजिक ज़िम्मेदारी जैसे मूल्य सभी धर्मों की साझा पहचान हैं। उन्होंने कहा कि आपसी संवाद और सहयोग ही समाज को मज़बूत बनाते हैं तथा कट्टरता और नफ़रत जैसी प्रवृत्तियों को कमज़ोर करते हैं।

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कश्मीर की सूफ़ी-ऋषि परंपरा को याद करते हुए कहा कि सदियों से इस धरती ने सांझी संस्कृति, धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक एकता का संदेश दिया है। यही विरासत आज भी कश्मीर की सबसे बड़ी ताक़त है और नई पीढ़ी तक इसे पहुँचाना समय की अहम ज़रूरत है।

विशेष रूप से युवाओं की मौजूदगी ने इस कार्यक्रम को और अधिक सार्थक बना दिया। कई युवाओं ने नशा-मुक्त समाज, सामाजिक जागरूकता और सामुदायिक सहयोग के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव तभी संभव है जब युवा स्वयं आगे आकर नेतृत्व की भूमिका निभाएँ और दूसरों को भी प्रेरित करें।

विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के अंतरधार्मिक संवाद केवल विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास और सहयोग को मज़बूत नहीं करते, बल्कि युवाओं को सकारात्मक दिशा देने का भी प्रभावी माध्यम बनते हैं। ऐसे आयोजन यह संदेश देते हैं कि जम्मू-कश्मीर की वास्तविक पहचान अमन, साझा संस्कृति, सामाजिक सद्भाव और विकास में निहित है।

"ड्रग-फ़्री कश्मीर" के उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए आयोजित यह कार्यक्रम इस विश्वास को और मज़बूत करता है कि जब समाज, प्रशासन, धार्मिक नेतृत्व और युवा एक साथ मिलकर काम करते हैं, तब न केवल नशे जैसी चुनौतियों का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सकता है, बल्कि एक ऐसे जम्मू-कश्मीर का निर्माण भी संभव है जहाँ भाईचारा, इंसानियत और साझा विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहे।

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