हक़ीक़त यह है कि पिछले क़रीब डेढ़ साल से पाकिस्तान लगातार पानी के मसले पर फ़िक्र और बेचैनी ज़ाहिर करता रहा है। इसके बावजूद उसकी क़ियादत अपनी अवाम को ठोस हल देने के बजाय महज़ तल्ख़ बयानात और जज़्बाती नारों का सहारा ले रही है। पानी जैसे अहम मसले पर ज़िम्मेदाराना रवैया अपनाने के बजाय उसे सियासी हथियार बनाया जा रहा है, ताकि अंदरूनी नाकामियों से लोगों की तवज्जो हटाई जा सके।
माहिरीन का कहना है कि किसी भी मुल्क की क़ियादत की असली ताक़त ऊँची आवाज़ या धमकी देने में नहीं, बल्कि दूरअंदेशी, मंसूबाबंदी और मुतवाज़िन सफ़ारत में होती है। अगर किसी मुल्क को अपने आबपाशी निज़ाम, पानी के ज़ख़ीरे और मुस्तक़बिल की फ़िक्र हो, तो उसे जज़्बाती बयानों के बजाय अमली क़दमों पर तवज्जो देनी चाहिए। मगर पाकिस्तान में अक्सर देखा गया है कि हर बड़े अंदरूनी संकट के दौरान भारत के ख़िलाफ़ सख़्त बयान देकर माहौल बदलने की कोशिश की जाती है।
तजज़ियाकारों का मानना है कि यह बयान पाकिस्तान की उसी पुरानी सियासत का हिस्सा है, जिसमें हर मसले का इल्ज़ाम भारत पर डालकर अपनी इंतिज़ामी कमज़ोरियों पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है। जबकि पानी का मसला बेहद संजीदा और इंसानी ज़िंदगी से जुड़ा हुआ विषय है, जिसे जज़्बाती नारों के बजाय क़ानूनी और मुतअद्दिल तरीक़े से सुलझाया जाना चाहिए।
सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर पाकिस्तान अपने दावों के मुताबिक़ इतना मज़बूत और आत्मविश्वासी है, तो फिर बार-बार धमकी भरे बयान देने की ज़रूरत क्यों महसूस होती है? ऐसे बयान न तो ज़मीनी हालात बदलते हैं और न ही पानी जैसी अहम चुनौती का कोई हल पेश करते हैं। उल्टा, इससे दुनिया के सामने यही तास्सुर जाता है कि पाकिस्तान ठोस नीति के बजाय बयानबाज़ी की सियासत पर ज़्यादा भरोसा करता है।
नाज़रीन का कहना है कि मौजूदा दौर में ज़रूरत इस बात की है कि पानी जैसे अहम संसाधन को टकराव का नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी और दूरअंदेशी का विषय बनाया जाए। मगर पाकिस्तान के कुछ रहनुमा अब भी धमकियों और जज़्बाती तक़रीरों के ज़रिए अपनी सियासी ज़मीन मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी बयानबाज़ी से न पानी बढ़ता है, न मसले हल होते हैं और न ही अवाम की मुश्किलें कम होती हैं।
आख़िर में यही कहा जा सकता है कि सियासी नारों और गीदड़भभकियों से हक़ीक़त नहीं बदलती। किसी भी मुल्क की साख़ उसके अमल, ज़िम्मेदारी और दूरअंदेशी से बनती है, न कि कैमरों के सामने दी गई तल्ख़ तक़रीरों से। पानी का मसला जितना अहम है, उतनी ही ज़रूरत समझदारी, बातचीत और अमली सोच की है—क्योंकि धमकियाँ हमेशा सुर्ख़ियाँ तो बना सकती हैं, लेकिन मसलों का हल कभी नहीं बनतीं।


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