“कश्मीरी पंडितों की वापसी से ही मुकम्मल होगी वादी की पहचान” : फ़ारूक़ अब्दुल्ला


जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ सियासी रहनुमा और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने एक बार फिर कश्मीरी पंडित समुदाय की वादी में सम्मानजनक और सुरक्षित वापसी की पुरज़ोर वकालत की है। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडित इस सरज़मीन की तहज़ीब, तारीख़ और पहचान का अहम हिस्सा हैं और उनकी मौजूदगी के बिना कश्मीर की गंगा-जमुनी रिवायत मुकम्मल नहीं हो सकती।

डॉ. अब्दुल्ला ने कहा कि कश्मीर सदियों से आपसी भाईचारे, मोहब्बत और साझा संस्कृति की मिसाल रहा है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि वक्त आ गया है कि सभी समुदाय मिलकर पुराने ज़ख्मों को भरने और एक बेहतर मुस्तक़बिल की तामीर के लिए आगे बढ़ें। उनके मुताबिक, कश्मीरी पंडितों की वापसी केवल एक समुदाय की वापसी नहीं, बल्कि कश्मीर की साझा विरासत और सामाजिक ताने-बाने की बहाली का प्रतीक होगी।

उन्होंने कहा कि वादी के लोग अपने बिछड़े भाइयों और बहनों का खुले दिल से इस्तक़बाल करने के लिए तैयार हैं। कश्मीरी समाज की रूह हमेशा मेल-मिलाप, इंसानियत और आपसी एहतराम पर आधारित रही है और यही जज़्बा आज भी लोगों के दिलों में मौजूद है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले दिनों में ऐसा माहौल और मज़बूत होगा जिसमें हर समुदाय ख़ुद को सुरक्षित, सम्मानित और बराबरी का हिस्सा महसूस करेगा।

सियासी और सामाजिक हलकों में डॉ. फ़ारूक़ अब्दुल्ला के इस बयान को सकारात्मक पैग़ाम के तौर पर देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि ऐसे बयान वादी में अमन, भाईचारे और सामाजिक एकता के संदेश को मज़बूती प्रदान करते हैं। यह संदेश उन तमाम कोशिशों के बरअक्स भी अहम माना जा रहा है जो कश्मीर की तस्वीर को लगातार तनाव और विभाजन के नज़रिए से पेश करने की कोशिश करती हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि मुख्यधारा के नेताओं द्वारा कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्समावेशन की बात करना समाज में भरोसे और संवाद के माहौल को बढ़ावा देता है। इससे यह धारणा भी मज़बूत होती है कि कश्मीर की अवाम अपने साझा अतीत और सांस्कृतिक रिश्तों को फिर से मज़बूत देखना चाहती है। उनके अनुसार, यह संदेश वादी की उस पारंपरिक पहचान को सामने लाता है जहाँ विभिन्न समुदाय सदियों तक साथ रहते आए हैं।

डॉ. अब्दुल्ला ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि कश्मीर की असली ताक़त उसकी विविधता और साझा संस्कृति में निहित है। उन्होंने कहा कि जब तक सभी समुदाय एक साथ आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक विकास और स्थायी अमन का सपना पूरी तरह साकार नहीं हो सकता। उन्होंने नौजवानों से भी अपील की कि वे आपसी भाईचारे, सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव की परंपराओं को आगे बढ़ाएँ।

स्थानीय नागरिकों ने भी इस बयान का स्वागत करते हुए कहा कि कश्मीरी पंडित और मुसलमान सदियों से एक-दूसरे के सुख-दुख के साझेदार रहे हैं। लोगों का मानना है कि वादी में स्थायी शांति और तरक़्क़ी के लिए सभी समुदायों का साथ मिलकर आगे बढ़ना ज़रूरी है। कई सामाजिक संगठनों ने भी इस तरह के बयानों को समाज में सकारात्मक सोच और विश्वास पैदा करने वाला क़दम बताया है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ऐसे वक्त में जब जम्मू-कश्मीर विकास, पर्यटन और सामाजिक स्थिरता के नए दौर की ओर बढ़ रहा है, तब मेल-मिलाप और पुनर्समावेशन के संदेश विशेष महत्व रखते हैं। उनका मानना है कि कश्मीरी पंडितों की वापसी पर सकारात्मक चर्चा न केवल सामाजिक रिश्तों को मज़बूत करेगी बल्कि वादी की बहुलतावादी पहचान को भी नई ऊर्जा प्रदान करेगी।

डॉ. फ़ारूक़ अब्दुल्ला का यह बयान एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि कश्मीर की पहचान उसकी साझा संस्कृति, आपसी सम्मान और भाईचारे में निहित है। उनके संदेश को वादी में अमन, एकता और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास और सहयोग को और अधिक सुदृढ़ कर सकता है।

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