कुपवाड़ा के इलाक़े में आयोजित "जश्न-ए-कुपवाड़ा" ने एक बार फिर यह साबित किया कि कश्मीर की असली पहचान उसकी तहज़ीब, भाईचारे, अमन और मुहब्बत में बसती है। हिंदुस्तानी फ़ौज की पहल पर आयोजित इस सांस्कृतिक तक़रीब में हर तबक़े के लोगों ने पूरे जोश और गर्मजोशी के साथ हिस्सा लिया।
तक़रीब का आग़ाज़ सूफ़ियाना कलाम और रूहानी मौसीकी से हुआ। सूफ़ी फ़नकारों की दिलकश पेशकश ने मौजूद लोगों को कश्मीर की सदियों पुरानी सूफ़ी रवायत और अमन के पैग़ाम से रूबरू कराया। महफ़िल में मौजूद लोगों ने इन पेशकशों को ख़ूब सराहा और देर तक तालियों की गूंज सुनाई देती रही।
इसके बाद मुक़ामी स्कूलों और कॉलेजों के तलबा ने रंगमंच के ज़रिये समाजी यकजहती, तालीम, नौजवानों की ज़िम्मेदारी और बेहतर मुस्तक़बिल का पैग़ाम पेश किया। नौजवान फ़नकारों की अदाकारी ने यह एहसास दिलाया कि कश्मीर का नया दौर हुनर, इल्म और तरक़्क़ी की राह पर गामज़न है। उनकी पेशकशों में अमन, भाईचारा और मुल्क की तरक़्क़ी का जज़्बा साफ़ नज़र आया।
तक़रीब का एक अहम मरकज़ "Know Your Army" नुमाइश रही। इस नुमाइश में फ़ौज के अलग-अलग पहलुओं, राहत और बचाव अभियानों, आधुनिक साज़ो-सामान, तालीमी और समाजी सरगर्मियों की मालूमात दी गई। नौजवानों और तलबा ने बड़े शौक़ से इस नुमाइश का जायज़ा लिया और फ़ौज के अफ़सरान से मुख़्तलिफ़ सवालात पूछे। अफ़सरान ने भी पूरे अपनत्व के साथ उनके सवालों के जवाब दिए और उन्हें मुल्क की हिफ़ाज़त तथा समाजी ख़िदमत में फ़ौज के किरदार से वाक़िफ़ कराया।
इस मौक़े पर सिविल इंतज़ामिया, मुक़ामी बुज़ुर्ग, वालिदैन और समाज के मुख़्तलिफ़ तबक़ात ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। सभी ने इस बात पर इत्मीनान ज़ाहिर किया कि ऐसी तक़रीबें लोगों के दरमियान भरोसा मज़बूत करती हैं और समाज में यकजहती को फ़रोग़ देती हैं।
मुक़ामी नौजवानों ने कहा कि उन्हें अपनी सलाहियत दिखाने के लिए ऐसा शानदार मंच मिला, जहाँ उन्होंने अपनी फ़नकारी और क़ाबिलियत का इज़हार किया। उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि भविष्य में भी इस तरह की सांस्कृतिक और तालीमी सरगर्मियाँ जारी रहेंगी, ताकि नई नस्ल सकारात्मक रास्ते पर आगे बढ़ सके।
महफ़िल में मौजूद लोगों का कहना था कि ऐसी तक़रीबें सिर्फ़ मनोरंजन का ज़रिया नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने और आपसी भरोसे को मज़बूत करने का भी बेहतरीन वसीला हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के ज़रिये नौजवान अपनी जड़ों, अपनी तहज़ीब और अपनी पहचान से और मज़बूती के साथ जुड़ते हैं।
"जश्न-ए-कुपवाड़ा" ने एक बार फिर यह पैग़ाम दिया कि जब अवाम, नौजवान, सिविल इंतज़ामिया और फ़ौज एक साथ मिलकर तरक़्क़ी, अमन और भाईचारे के लिए कंधे से कंधा मिलाकर चलें, तो हर इलाक़ा उम्मीद, खुशहाली और नए मौक़ों की मिसाल बन जाता है।
यह रंगारंग तक़रीब कश्मीर में बढ़ती सामाजिक हमआहंगी, सिविल-मिलिट्री यकजहती और नौजवानों की सकारात्मक भागीदारी की एक शानदार तस्वीर पेश करती है। साथ ही यह भी दिखाती है कि हिंदुस्तानी फ़ौज सिर्फ़ सरहदों की निगेहबान ही नहीं, बल्कि कश्मीर में तालीम, संस्कृति, नौजवानों के सशक्तिकरण और समाजी तरक़्क़ी की भी एक मज़बूत साथी है।
यक़ीनन, "जश्न-ए-कुपवाड़ा" जैसी पहलें कश्मीर में अमन, भाईचारे और तरक़्क़ी के नए अफ़क़ खोल रही हैं। सूफ़ियाना रंग, नौजवानों का जोश और फ़ौज-अवाम की बढ़ती क़ुर्बत इस बात की गवाही देती है कि कश्मीर एक रौशन, पुरअमन और तरक़्क़ीपसंद मुस्तक़बिल की जानिब मज़बूती से क़दम बढ़ा रहा है।


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