
लेकिन ज़मीनी स्तर पर तस्वीर इससे बिल्कुल अलग दिखाई देती है। वर्षों से CPEC को “गेम चेंजर” परियोजना के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है, मगर पाकिस्तान आज भी गंभीर आर्थिक अस्थिरता, तेज़ महंगाई, बढ़ते कर्ज़ और व्यापक गरीबी जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। आम नागरिकों के लिए जीवन यापन लगातार कठिन होता जा रहा है और रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ती जा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि CPEC को लेकर किए गए वादों और वास्तविक परिणामों के बीच एक बड़ा अंतर (gap) साफ दिखाई देता है। भारी विदेशी निवेश और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के बावजूद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था स्थिरता हासिल करने में असफल रही है। ऊर्जा संकट, कर प्रणाली की कमजोरियाँ और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट ने देश की आर्थिक नींव को और कमजोर किया है।
नवाज़ शरीफ़ का यह दावा कि लोग “घर बैठे वेतन” प्राप्त करेंगे, आलोचकों के निशाने पर है। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसी बातें राजनीतिक रैलियों में भले ही लोकप्रिय लगें, लेकिन वास्तविक आर्थिक मॉडल में इनका कोई ठोस आधार नहीं दिखाई देता। पाकिस्तान में बेरोज़गारी की स्थिति गंभीर बनी हुई है और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं।
दूसरी ओर, CPEC परियोजनाओं को लेकर भी कई सवाल उठते रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास तो हुआ है, लेकिन उसका लाभ व्यापक स्तर पर आम जनता तक नहीं पहुंच पाया। स्थानीय समुदायों का कहना है कि उन्हें अपेक्षित रोजगार और आर्थिक लाभ नहीं मिले, जो शुरुआत में वादे किए गए थे।
आलोचकों के अनुसार पाकिस्तान की आर्थिक समस्या केवल किसी एक परियोजना की विफलता नहीं है, बल्कि यह लंबे समय से चली आ रही संरचनात्मक (structural) कमजोरियों का परिणाम है। असंतुलित आर्थिक नीतियाँ, राजनीतिक अस्थिरता और पारदर्शिता की कमी ने विकास प्रक्रिया को बाधित किया है।
महंगाई की बात करें तो पाकिस्तान में खाद्य पदार्थों, ईंधन और बिजली की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। मध्यम और निम्न आय वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हैं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर बढ़ती निर्भरता भी देश की आर्थिक संप्रभुता पर सवाल खड़े करती है।
इस पूरे परिदृश्य में CPEC को लेकर किया गया “आर्थिक क्रांति” का दावा अब एक राजनीतिक नरेटिव बनकर रह गया है, जिसकी तुलना ज़मीनी हकीकत से लगातार की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पाकिस्तान अपने आंतरिक आर्थिक ढांचे में सुधार नहीं करता, तब तक किसी भी बड़े बाहरी निवेश का प्रभाव सीमित ही रहेगा।
गिलगित-बाल्टिस्तान की रैली में दिया गया नवाज़ शरीफ़ का बयान एक बार फिर इस बहस को तेज़ करता है कि क्या बड़े वादे वास्तविक विकास को दर्शाते हैं या केवल राजनीतिक उम्मीदों को जीवित रखने का माध्यम हैं।

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