
एनआईए की तहकीकात के मुताबिक, पहलगाम में निर्दोष नागरिकों को मजहबी पहचान के आधार पर निशाना बनाकर अंजाम दिए गए इस हमले के महज़ ढाई घंटे बाद TRF की ओर से जिम्मेदारी लेने का पहला संदेश सोशल मीडिया पर जारी किया गया। जांच एजेंसियों ने जब उस डिजिटल गतिविधि का विश्लेषण किया तो पता चला कि यह पोस्ट पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बट्टाग्राम इलाके से संचालित की गई थी।
जांच रिपोर्ट के अनुसार, हमले के तुरंत बाद जिम्मेदारी लेने का मकसद दहशत फैलाना और अपने समर्थकों के बीच प्रचार हासिल करना था। लेकिन जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस हमले की निंदा बढ़ने लगी और पाकिस्तान पर सवाल उठने लगे, वैसे-वैसे TRF और उसके आकाओं ने अपनी रणनीति बदलनी शुरू कर दी।
एनआईए के दस्तावेज़ बताते हैं कि हमले के लगभग तीन दिन बाद एक दूसरा संदेश जारी किया गया, जिसमें TRF ने हमले में अपनी भूमिका से इनकार करने की कोशिश की। डिजिटल फोरेंसिक जांच में यह संदेश पाकिस्तान के रावलपिंडी से जुड़े नेटवर्क और एक पाकिस्तानी मोबाइल नंबर के माध्यम से प्रसारित पाया गया। यही वह बिंदु है जिसने पाकिस्तान के दोहरे रवैये को पूरी तरह उजागर कर दिया।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संगठन का हमले से कोई संबंध नहीं था, तो पहले जिम्मेदारी क्यों ली गई और बाद में अचानक बयान क्यों बदला गया? यही सवाल पाकिस्तान के उस लंबे समय से चले आ रहे नैरेटिव को कमजोर करता है जिसमें वह आतंकवाद से किसी भी प्रकार के संबंध से इंकार करता रहा है।
एनआईए ने अपनी चार्जशीट में पाकिस्तान स्थित TRF प्रमुख साजिद जट्ट को इस पूरी साजिश का मुख्य मास्टरमाइंड बताया है। जांच के अनुसार, हमले की योजना, समन्वय और आतंकियों को मार्गदर्शन देने की गतिविधियां पाकिस्तान से संचालित नेटवर्क के माध्यम से की गईं। एजेंसी का मानना है कि यह कोई स्थानीय या स्वतःस्फूर्त घटना नहीं थी, बल्कि सुनियोजित आतंकी साजिश थी, जिसे सीमा पार बैठे संचालकों के समर्थन से अंजाम दिया गया।
विश्लेषकों के मुताबिक, TRF को लंबे समय से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और आतंकी ढांचे का एक "प्रॉक्सी फ्रंट" माना जाता रहा है। इस संगठन का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान सीधे तौर पर जिम्मेदारी से बच सके। लेकिन इस मामले में डिजिटल सबूतों और आईपी ट्रेसिंग ने उस परदे को भी हटा दिया है।
पहलगाम हमले में निर्दोष नागरिकों को धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया था। जांच एजेंसियों के अनुसार, हमलावरों ने चुन-चुन कर लोगों को टारगेट किया, जो इस बात का संकेत है कि हमला केवल आतंक फैलाने के लिए नहीं बल्कि सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के उद्देश्य से भी किया गया था।
एनआईए की चार्जशीट में सामने आए तथ्य यह भी दर्शाते हैं कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी ढांचे ने डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया नेटवर्क और सीमा पार संचार तंत्र का इस्तेमाल करते हुए हमले के बाद नैरेटिव को नियंत्रित करने की कोशिश की। हालांकि फोरेंसिक विश्लेषण और तकनीकी जांच ने उन प्रयासों को नाकाम कर दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला ISI की एक और बड़ी नाकामी को दर्शाता है। जिस योजना के तहत TRF को एक स्थानीय और स्वतंत्र संगठन के रूप में पेश किया गया था, वही योजना अब जांच के दौरान बिखरती दिखाई दे रही है। आईपी एड्रेस, संचार रिकॉर्ड और डिजिटल गतिविधियों की श्रृंखला ने पाकिस्तान की भूमिका को पहले से कहीं अधिक स्पष्ट बना दिया है।
एनआईए की चार्जशीट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों को प्रॉक्सी के रूप में इस्तेमाल कर दुनिया को गुमराह करने की कोशिश करता रहेगा। पहलगाम हमले से जुड़ी टाइमलाइन, डिजिटल ट्रेस और मास्टरमाइंड की पहचान इस बात की मजबूत तस्दीक करती है कि आतंक के इस नेटवर्क की जड़ें सीमा पार तक फैली हुई हैं।

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