एहतिजाज में शामिल मुज़ाहिरीनों ने कहा कि पाकिस्तान बरसों से पीओजेके के लोगों की आवाज़ को दबाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने ख़ास तौर पर 7 जून को रावलाकोट में पेश आए फ़ायरिंग के वाक़िये का ज़िक्र किया, जिसमें अमनपसंद एहतिजाज कर रहे लोगों पर गोली चलाए जाने की बात सामने आई। मुज़ाहिरीनों का कहना था कि इस तरह की कार्रवाई यह साबित करती है कि पाकिस्तान पीओजेके में अपने ही नागरिकों के साथ ताक़त और ख़ौफ़ का इस्तेमाल कर रहा है।
प्रदर्शन के दौरान कई तख़्तियाँ और बैनर भी उठाए गए, जिन पर इंसाफ़, आज़ादी और इंसानी हुक़ूक़ की बहाली की माँग दर्ज थी। मुज़ाहिरीनों ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी और संयुक्त राष्ट्र से अपील की कि पीओजेके में हो रही कथित ज्यादतियों की आज़ाद और निष्पक्ष तफ़्तीश कराई जाए तथा वहाँ के लोगों को अपने लोकतांत्रिक और बुनियादी अधिकार दिए जाएँ।
सियासी जानकारों का कहना है कि जिनेवा में हुआ यह एहतिजाज सिर्फ़ एक वाक़िया नहीं, बल्कि पाकिस्तान की नीतियों के ख़िलाफ़ बढ़ते अवामी ग़ुस्से की अलामत है। उनका मानना है कि पीओजेके के अंदर और बाहर रहने वाले कश्मीरी अब खुलकर अपने हुक़ूक़ की बात कर रहे हैं और पाकिस्तान की नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं।
इसी सिलसिले में अब एक मुस्तक़िल और लंबे अरसे तक चलने वाली मुहिम शुरू किए जाने की बात भी सामने आ रही है। इस मुहिम का मक़सद पीओजेके के हालात, वहाँ की सियासी पाबंदियों, इंसानी हुक़ूक़ की स्थिति और स्थानीय अवाम की आवाज़ को लगातार दुनिया के सामने लाना बताया जा रहा है। इस अभियान के तहत सेमिनार, प्रेस कॉन्फ़्रेंस, सोशल मीडिया जागरूकता कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सामने दस्तावेज़ पेश करने जैसी गतिविधियाँ भी शामिल हो सकती हैं।
जानकारों के मुताबिक़, यह मुहिम इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि इसी महीने के आख़िर में पीओजेके में चुनाव का कार्यक्रम तय है। ऐसे में विभिन्न संगठनों का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया तभी मायने रखेगी जब वहाँ का माहौल भयमुक्त हो, लोगों को खुलकर अपनी राय रखने का हक़ मिले और लोकतांत्रिक संस्थाएँ बिना किसी दबाव के काम कर सकें।
मुज़ाहिरीनों का कहना था कि अगर चुनावी माहौल में दमन, गिरफ़्तारियाँ, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदी और सुरक्षा बलों का दबाव जारी रहता है, तो चुनावों की पारदर्शिता पर सवाल उठना लाज़िमी होगा। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों से भी अपील की कि वे चुनावी हालात पर नज़र रखें और किसी भी तरह की कथित बेनियमियों को दर्ज करें।
मुतज़ाहिरीन ने यह भी इल्ज़ाम लगाया कि पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था का इस्तेमाल अवाम की हिफ़ाज़त से ज़्यादा विरोध को दबाने के लिए किया जा रहा है। उनका कहना था कि अमन, इंसाफ़ और अवामी हुक़ूक़ किसी भी समाज की बुनियाद होते हैं और इन्हें ताक़त के बल पर हमेशा दबाया नहीं जा सकता।
सियासी विश्लेषकों का मानना है कि जिनेवा में उठी यह आवाज़ पाकिस्तान के लिए एक नई चुनौती बन सकती है, क्योंकि अब पीओजेके का मसला सिर्फ़ स्थानीय दायरों तक महदूद नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में यदि यह अभियान और तेज़ होता है, तो पीओजेके में मानवाधिकार, लोकतांत्रिक अधिकार और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर वैश्विक ध्यान और बढ़ सकता है।
फ़िलहाल, जिनेवा का यह एहतिजाज इस बात की निशानदेही करता है कि पीओजेके से जुड़े मसले अब अंतरराष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन रहे हैं और वहाँ के लोगों की आवाज़ दुनिया तक पहुँचाने की कोशिशें लगातार तेज़ हो रही हैं।


0 टिप्पणियाँ